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जनसत्ता सरोकार

व्यापार समझौता और किसानों का हित

जनसत्ता| 26 जुलाई, 2026

देश का किसान एक बार फिर चिंता में है। तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध लगभग डेढ़ वर्ष तक चले ऐतिहासिक आंदोलन के बाद यह उम्मीद जगी थी कि सरकार और किसानों के बीच विश्वास का नया अध्याय शुरू होगा। मगर आज भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर हो रही चर्चा और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत से व्यापार को पांच सौ अरब डालर तक पहुंचाने के लक्ष्य ने देश के किसानों की आशंकाओं को फिर से जिंदा कर दिया है। प्रश्न सीधा है– यदि इस विशाल व्यापारिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत के कृषि और डेयरी बाजार में रियायतें दी जाती हैं, तो क्या इसकी सबसे बड़ी कीमत किसानों को चुकानी पड़ेगी?

अमेरिका की महत्त्वाकांक्षा

भारत और अमेरिका के बीच पिछले कई महीनों से अंतरिम व्यापार समझौते पर बातचीत चल रही है। दोनों देशों के अधिकारियों के सार्वजनिक बयानों और विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अधिकांश मुद्दों पर सहमति बनने की दिशा में प्रगति हुई है। दरअसल, बीते फरवरी में अंतरिम समझौते के तुरंत बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के अमेरिका से आयात को आगामी कुछ वर्षों में पांच सौ अरब डालर तक पहुंचाने की महत्त्वाकांक्षा सार्वजनिक रूप से व्यक्त की थी। वर्तमान में अमेरिका से भारत का आयात लगभग 45–50 अरब डालर के आसपास है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि व्यापार को कई गुना बढ़ाना है, तो अमेरिका किन क्षेत्रों के लिए भारत से उसका बाजार खुलवाना चाहता है?

इस प्रश्न का उत्तर कृषि और डेयरी क्षेत्र की ओर संकेत करता है। अब तक भारत ने इन दोनों क्षेत्रों को संवेदनशील मानते हुए संरक्षणात्मक उपाय अपनाए हुए हैं। यही नीति देश के करोड़ों किसानों और दुग्ध उत्पादकों के हितों की रक्षा का आधार रही है। मगर व्यापार वार्ताओं से जुड़ी सार्वजनिक चर्चाओं और रिपोर्टों में संकेत मिले हैं कि इन क्षेत्रों में अमेरिका के लिए विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। इससे किसानों की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में प्रवेश कर जाएंगे और यहां के घरेलू बाजार में प्रतिस्पर्धा के कारण स्थानीय किसानों के हित प्रभावित होना तय माना जा रहा है।

मुनाफे की रणनीति

अमेरिका की कृषि व्यवस्था पूंजी-प्रधान और अत्यधिक संरक्षित कृषि व्यवस्थाओं में गिनी जाती है। वहां कृषि का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में योगदान एक फीसद से भी कम है और कृषि पर निर्भर आबादी भी बहुत सीमित है। एक सच्चाई यह भी है कि अमेरिकी सरकार अपने किसानों को हर वर्ष अरबों डालर की सबसिडी और वित्तीय सहायता देती है। वर्तमान में यह राशि करीब तीस अरब डालर है। अब ट्रंप सरकार इस पर मुनाफा चाहती है और अपने कृषि निर्यात पर ध्यान केंद्रित कर रही है। यही कारण है कि ट्रंप बार-बार भारत-अमेरिका व्यापार को तेज गति से बढ़ाने की बात कर रहे हैं। मगर, इतना बड़ा व्यापारिक लक्ष्य तभी व्यावहारिक होगा, जब भारत जैसे विशाल उपभोक्ता बाजार में अमेरिकी कृषि एवं डेयरी उत्पादों की पहुंच बढ़ेगी। इसलिए यह मानने के पर्याप्त आधार हैं कि प्रस्तावित व्यापार समझौते के पीछे अमेरिकी कृषि उत्पादों के निर्यात को भारत के विशाल बाजार तक पहुंचाने का उद्देश्य मुनाफे की रणनीति हो सकती है।

भारत की स्थिति

इसके विपरीत भारत की वास्तविकता बिल्कुल अलग है। यहां कृषि का जीडीपी में योगदान लगभग सोलह फीसद है, जबकि करीब 46 फीसद आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। इसी कारण भारतीय किसान गरीब हैं। इसके अलावा अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं, वे पहले से ही बढ़ती लागत, सिंचाई, उर्वरक, बीज, मौसम और बाजार की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि मात्र छह फीसद किसान ही अपनी फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेच पाते हैं। शेष को तो अपनी उपज खुले बाजार में अपेक्षाकृत कम कीमतों पर बेचनी पड़ती है। ऐसी स्थिति में यदि अत्यधिक प्रतिस्पर्धी, आधुनिक तकनीक से लैस और सरकारी सहायता प्राप्त अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में प्रवेश करते हैं, तो यहां के किसानों की आय पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।

यह केवल मूल्य प्रतिस्पर्धा का प्रश्न नहीं होगा, बल्कि करोड़ों किसानों की आजीविका, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि आधारित उद्योगों के भविष्य का सवाल बन जाएगा। इसका प्रभाव खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, डेयरी सहकारी संस्थाओं, ग्रामीण व्यापार, परिवहन तथा लाखों छोटे व्यवसायों तक पहुंच सकता है। इसलिए कृषि और डेयरी से जुड़े किसी भी निर्णय का मूल्यांकन केवल व्यापारिक लाभ या आयात-निर्यात के आंकड़ों के आधार पर नहीं किया जा सकता।

प्रतिस्पर्धा की चुनौती

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर यह प्रतिस्पर्धा किसके बीच होगी? एक ओर विश्व की सबसे समृद्ध अर्थव्यवस्था अमेरिका है, जहां के किसानों को व्यापक सरकारी संरक्षण और अरबों डालर की सबसिडी प्राप्त है। दूसरी ओर भारत है, जहां करोड़ों छोटे और गरीब किसान खेती को अपनी आजीविका का एकमात्र आधार मानते हैं। ऐसे में दुनिया की सबसे संपन्न कृषि व्यवस्था और कमजोर किसानों के बीच प्रतिस्पर्धा कराना न तो आर्थिक न्याय है और न ही दूरदर्शी नीति। यदि भारतीय किसान आर्थिक रूप से समृद्ध होते, तो उनकी आय स्थिर होती और वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार होते, तब मुक्त व्यापार का तर्क स्वीकार किया जा सकता था। मगर जब भारतीय किसान स्वयं लागत और आय के संकट से जूझ रहा हो, तब उसे दुनिया की सबसे अधिक सबसिडी प्राप्त कृषि व्यवस्था के सामने खड़ा कर देने को न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।

भारत पहले ही विनिर्माण क्षेत्र में ऐसी असंतुलित प्रतिस्पर्धा का अनुभव कर चुका है। वर्षों से चीन के सस्ते उत्पादों ने भारतीय बाजार में गहरी पैठ बनाई है। परिणामस्वरूप अनेक घरेलू उद्योग कमजोर पड़ गए, कई सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम विनिर्माण इकाइयां संघर्ष करती रहीं और 'मेक इन इंडिया' जैसी महत्त्वाकांक्षी पहल के बावजूद भारत अभी तक अपेक्षित औद्योगिक आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए प्रयासरत है। जब विनिर्माण क्षेत्र में चीन के साथ असंतुलित प्रतिस्पर्धा के दुष्परिणामों से हम आज तक पूरी तरह नहीं उबर पाए हैं, तो क्या वही गलती अब कृषि और डेयरी जैसे कहीं अधिक संवेदनशील क्षेत्रों में अमेरिका के साथ दोहराई जानी चाहिए?

तीन कृषि कानूनों को लेकर आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया था कि कृषि से जुड़े निर्णय किसानों का विश्वास जीतकर ही सफल हो सकते हैं। सरकार का पहला दायित्व है कि वह पूर्ण पारदर्शिता अपनाए, किसानों को विश्वास में ले और यह स्पष्ट करे कि भारतीय कृषि हितों से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा। भारत को अमेरिका के साथ व्यापार अवश्य बढ़ाना चाहिए, वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका भी लगातार मजबूत होनी चाहिए, मगर किसी भी व्यापार समझौते की सफलता का पैमाना केवल आंकड़ों का लक्ष्य नहीं हो सकता। उससे कहीं बड़ा प्रश्न यह है कि उस लक्ष्य की कीमत कौन चुकाएगा? यदि इसकी कीमत भारत के गरीब किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़े, तो यह केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं होगा, बल्कि देश की विकास यात्रा के लिए एक गंभीर चुनौती होगी।

भारत को अमेरिका के साथ व्यापार अवश्य बढ़ाना चाहिए, मगर किसी भी व्यापार समझौते की सफलता का पैमाना केवल आंकड़ों का लक्ष्य नहीं हो सकता। उससे कहीं बड़ा प्रश्न यह है कि उस लक्ष्य की कीमत कौन चुकाएगा? यदि इसकी कीमत भारत के गरीब किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़े, तो यह केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं होगा, बल्कि देश की विकास यात्रा के लिए एक गंभीर चुनौती होगी।

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As printed in जनसत्ता सरोकार.

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