अमर उजाला
पर्यटन के आंकड़ों में बढ़ता चिकित्सा यात्रा का दायरा
भारत में पर्यटन की तस्वीर बदल रही है। भारतीयों की यात्राएं केवल घूमने या छुट्टियां बिताने तक सीमित नहीं हैं। अब हर तीसरी यात्रा चिकित्सा ईलाज के कारण है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के जुलाई 2025 से जून 2026 के घरेलू पर्यटन व्यय सर्वेक्षण के अनुसार 29.6 प्रतिशत स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के लिए से संबंधित रहा है। वही सबसे अधिक आकंडा घरेलू यात्राओं में 47.7 प्रतिशत धार्मिक और तीर्थ उद्देश्यों से है। और 22.1 प्रतिशत छुट्टी, मनोरंजन तथा विश्राम के लिए। तीर्थ यात्रा भारत की सामाजिक परंपरा है, इसलिए इसका सबसे अधिक होना समझ आता है। और अवकाश यात्रा सोशल मीडिया के कारण तेजी से बदलती जीवनशैली का संकेत है। लेकिन चिकित्सा के लिए होने वाली हर यात्रा एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि क्यों लोगों को उपचार के लिए यात्रा करनी पड़ रही है?
हालांकि इसका आर्थिक महत्व भी लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2025 में भारतीयों ने देश के भीतर यात्रा और पर्यटन पर लगभग 17.7 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जो भारतीयों के वार्षिक कुल यात्रा एवं पर्यटन व्यय का करीब 86 प्रतिशत था। इस व्यय में लगभग 10 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि हुई। इससे स्पष्ट है कि भारत की पर्यटन अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा आधार स्वयं भारतीय हैं। लेकिन इसी अर्थव्यवस्था में चिकित्सा यात्रा का बढ़ता हिस्सा पर्यटन से आगे बढ़कर स्वास्थ्य व्यवस्था का प्रश्न भी बनता जा रहा है।
घूमने के लिए किसी शहर में जाना पर्यटन है, लेकिन बीमारी के उपचार के लिए अपना शहर छोड़ना स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच का प्रश्न है। इस सर्वे के अनुसार स्वास्थ्य एवं चिकित्सा यात्रा पर औसत खर्च ग्रामीण क्षेत्र में 29,454 रुपये और शहरी क्षेत्र में 41,649 रुपये रहा। ग्रामीण परिवारों के स्वास्थ्य संबंधी यात्रा व्यय में लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा उपचार और दवाइयों पर गया, जबकि सरकारी प्रतिपूर्ति केवल 8.2 प्रतिशत रही। यात्रा, ठहरने, भोजन और साथ जाने वाले परिजन की आय का नुकसान अलग है। यानी बीमारी की कीमत केवल अस्पताल में नहीं चुकाई जातीय अस्पताल तक पहुंचने की दूरी भी परिवार की आर्थिक कीमत बढ़ाती है। ग्रामीण भारत में यह समस्या और स्पष्ट है। रात में ठहरने वाली घरेलू यात्राओं में ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य एवं चिकित्सा यात्राओं की हिस्सेदारी 38.4 प्रतिशत है जबकि शहरों में ये 16.5 प्रतिशत है।
एक अन्य तथ्य ये भी है कि उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल मिलकर स्वास्थ्य एवं चिकित्सा यात्राओं में 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखते हैं। इनकी विशाल आबादी इसका एक कारण है, लेकिन केवल आबादी पूरी स्थिति नहीं समझाती। इन राज्यों के बड़े हिस्सों में उच्च स्तरीय और विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार उनकी आबादी और आवश्यकताओं के अनुपात में पर्याप्त नहीं हो पाया है। परिणामस्वरूप गंभीर बीमारी और जटिल उपचार के लिए मरीजों को दूसरे शहरों और राज्यों का रुख करना पड़ता है। यह लंबे समय से चली आ रही स्वास्थ्य नियोजन की क्षेत्रीय चुनौती का एक संकेत है। दिल्ली इसका स्पष्ट उदाहरण है। वहाँ एम्स जैसे संस्थान में देश के अलग-अलग हिस्सों से मरीज पहुंचते हैं क्योंकि उन्हें उच्च स्तरीय विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधा मिलती है और उसकी लागत सरकारी होने के कारण बहुत कम है। यह इन संस्थानों की क्षमता और लोगों के विश्वास को दर्शाता है, लेकिन साथ ही यह भी बताता है कि विशेषज्ञ चिकित्सा वो भी सरकारी अब तक मात्र कुछ चुनिंदा शहरों में ही केंद्रित है। इस पक्ष पर सच्चाई ये भी है कि उपचार अपेक्षाकृत कम लागत पर मिल सकता है, लेकिन दिल्ली तक पहुंचना, वहां रहना और बार-बार लौटना गरीब और निम्न मध्यम वर्गीय परिवार के लिए बड़ा आर्थिक बोझ बन सकता है।
दूसरी ओर, भारत ने कुछ राज्यों में निजी चिकित्सा क्षेत्र के अंतर्गत कुछ ऐसी विशेषज्ञता विकसित की है जिसने वे चिकित्सा पर्यटन का महत्वपूर्ण केंद्र बन गये हैं। गुजरात इसका प्रमुख उदाहरण है। हृदय चिकित्सा, कैंसर उपचार, अस्थि एवं जोड़ चिकित्सा, घुटना प्रत्यारोपण, बांझपन उपचार और आईवीएफ जैसी सेवाओं के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से मरीज आते हैं। इससे वहाँ अस्पतालों के साथ जांच, दवा, होटल और परिवहन का आर्थिक तंत्र भी विकसित हुआ है जिसका आर्थिक विकास में अच्छा योगदान है।केरल ने आधुनिक चिकित्सा को आयुर्वेद, पुनर्वास तथा स्वास्थ्य और कल्याण सेवाओं के साथ जोड़कर स्वास्थ्य पर्यटन का अलग मॉडल विकसित किया है। चेन्नई, हैदराबाद, मुंबई और बेंगलुरु भी जटिल चिकित्सा के बड़े केंद्र हैं।
पिछले कुछ सालों में भारत की चिकित्सा क्षमता का अंतरराष्ट्रीय महत्व भी बढ़ा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024 में 6.44 लाख से अधिक विदेशी नागरिक चिकित्सा उद्देश्य से भारत आए। दुनिया भारत को उपचार के केंद्र के रूप में देखने लगी है। लेकिन यहीं विरोधाभास है। विदेशी मरीज भारत इसलिए आता है क्योंकि यहां विशेषज्ञ उपचार उपलब्ध है, जबकि भारत का अपना नागरिक दूसरे शहर इसलिए जाता है क्योंकि उसके क्षेत्र में वही सुविधा उपलब्ध नहीं है। विदेशी मरीज की यात्रा आर्थिक अवसर है पर भारतीय मरीज की मजबूरी वाली यात्रा स्वास्थ्य सुविधाओं के असमान वितरण का संकेत है। इसलिए चिकित्सा पर्यटन और स्वास्थ्य सुविधाओं के विकेंद्रीकरण को अलग-अलग मुद्दे नहीं माना जा सकता। पर्यटन के ये आकड़ें स्वास्थ्य नीति में दर्ज होना चाहिए कि किस जिले से कितने मरीज इलाज के लिए बाहर जाते हैं और किन बीमारियों के लिए जाते हैं। यदि किसी क्षेत्र से लगातार मरीज कैंसर, आईवीएफ या घुटना प्रत्यारोपण के लिए बाहर जा रहे हैं, तो यह उस क्षेत्र की चिकित्सा आवश्यकता का संकेत है। इससे स्वास्थ्य में वित्तीय निवेश की योजना को तय करना आसान होगा।
भारत को चिकित्सा पर्यटन का वैश्विक केंद्र बनना चाहिए। इससे रोजगार, निवेश, विदेशी मुद्रा और सेवा क्षेत्र को लाभ मिलेगा। लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा इस बात से होगी कि एक सामान्य नागरिक को अच्छे इलाज के लिए कितनी दूर जाना पड़ता है। बड़े चिकित्सा केंद्रों की विशेषज्ञता को छोटे शहरों और जिलों से जोड़ना होगा। हर जिले में कैंसर या हृदय प्रत्यारोपण जैसी अत्यंत जटिल चिकित्सा संभव नहीं होगी, लेकिन आधुनिक जांच, आपात चिकित्सा, विशेषज्ञ परामर्श और आवश्यक शल्य चिकित्सा की मजबूत व्यवस्था विकसित की जा सकती है। दुनिया इलाज के लिए भारत आए, लेकिन भारत का नागरिक इलाज के लिए अपने ही देश में भटकने को मजबूर न हो। चिकित्सा पर्यटन भारत की आर्थिक शक्ति बन सकता है, लेकिन इलाज की दूरी कम करना उसकी सामाजिक शक्ति की पहचान होगी।