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राजस्थान पत्रिका

चांदी की तेजी से असंगठित क्षेत्र के रोजगार पर संकट

विश्लेषण : मांग के कारण नहीं, बल्कि चीन की ओर से इसकी आपूर्ति पर हुए एकाएक नियंत्रण से बिगड़े हालात

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पिछले चार महीनों में चांदी के दामों में तीन गुना की बढ़ोतरी हो चुकी है और वर्तमान में दाम ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गए हैं। यकीनन इसके दुष्प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारतीय समाज पर भी पड़ने शुरू हो गए हैं। यह बहुत सोचनीय विषय हो गया है कि अब चांदी के मूल्य को किस तरह से नियंत्रित किया जाएगा? सितंबर में चांदी एक लाख रुपए प्रति किलोग्राम के दाम पर भारतीय बाजार में उपलब्ध थी, जो अब तीन लाख रुपए प्रति किलोग्राम के पार चली गई है। कैसे इस अत्यधिक मूल्य पर आभूषण का बाजार टिक पाएगा? क्या होगा अब प्रतिदिन की मजदूरी पर चांदी के आभूषण बनाने वाले कारीगरों के जीवनयापन का?

चांदी के दामों में हुई बढ़ोतरी, इसकी मांग के कारण नहीं है अपितु इसकी आपूर्ति पर हुए एकाएक नियंत्रण के कारण है। चीन ने अपने यहां से चांदी के निर्यात को प्रतिबंधित कर दिया है और अब वहां कंपनियों के लिए लाइसेंस अनिवार्य हो गया है। इसी का परिणाम है कि भारतीय बाजार में चांदी के दाम नियंत्रण से बाहर हो गए हैं। चीन के जरिए लगाए इन प्रतिबंधों का मुख्य कारण भारत और विश्व के कुछ अन्य दूसरे देशों को सोलर ऊर्जा, एआइ, मोबाइल निर्माण आदि में पीछे करना है क्योंकि इन सबके उत्पादन में चांदी कच्चे माल के तौर पर बड़ी मात्रा में उपयोग की जाती है। चीन विश्व में चांदी का उत्पादन करने वाला सबसे बड़ा मुल्क है।

भारत के लिए ये स्थिति इसलिए बहुत विपरीत है क्योंकि घरेलू बाजार में विनिर्माण क्षेत्र के जरिए इसकी मांग बढ़ा दी गई है और दूसरा भारत अपनी कुल उपभोग क्षमता का 90 प्रतिशत आयात करता है। चांदी के मूल्य में हुई बढ़ोतरी उत्पादन के क्षेत्र में आने वाले कच्चे माल के रूप में ज्यादा चिंता करने वाला सबब नहीं है क्योंकि बड़े औद्योगिक घरानों द्वारा सोलर के उत्पादन में या फिर मोबाइल के उत्पादन में ये महंगे दामों पर भी खरीदी जा सकती है। क्योंकि वह एक कच्चे माल के रूप में उपयोग में आनी है परंतु आभूषण का व्यवसाय तो इन बढ़े हुए दामों पर किसी भी दशा में टिक पाना संभव नहीं है।

भारत में चांदी का उपयोग आभूषणों और पूजा के बर्तनों में हमेशा से होता रहा है। भारतीयों को सदैव से सोने से ज्यादा आकर्षण चांदी के प्रति रहा है क्योंकि इसकी लागत तुलनात्मक रूप से हमेशा कम होती है, लेकिन अब यह स्थिति बिल्कुल विपरीत हो गई है।

इसी के चलते ये आंकड़े सामने आए हैं कि घर में बच्चियों और महिलाओं द्वारा पहने जाने वाली पायजेबों की लागत भी एकाएक बहुत बढ़ गई है। इसलिए बहुत हद तक अब यह संभव है कि पायजेब/पायल जैसे साधारण आभूषण की खरीदारी भी अब भारतीय समाज में गरीब आदमी द्वारा एकाएक बंद कर दी जाए क्योंकि इसकी लागत पांच हजार से बढ़कर बीस हजार रुपए तक चली गई है, यानी अब चांदी भी आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गई है। इसके चलते आभूषण का व्यवसाय करने वाले व्यापारियों के लिए भी बड़ी समस्या खड़ी हो गई है।

एक अनुमान के मुताबिक एक से दो क्विंटल प्रतिमाह तक बेचने वाले व्यापारी की क्षमता अब घटकर 20 से 30 किलो प्रतिमाह पर आकर सिमट गई है। यह स्थिति उनके लिए और चिंताजनक इसलिए भी हो गई है क्योंकि उनके पास पड़ा स्टॉक अब बिक नहीं रहा और विक्रय हो चुके स्टॉक के देनदारों से नकद वसूली में भी बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। एकाएक पूरे व्यवसाय का चक्र मूल्यों में हुई बढ़ोतरी से बुरी तरह से प्रभावित हो गया है।

इस नकारात्मक बदलाव के चलते कारीगर एकाएक बेरोजगार हो गए हैं। छोटे स्तर पर विभिन्न घरेलू महिलाएं, जो इस कारीगरी के पेशे से भी जुड़ी होती हैं और जिनकी मासिक आय पांच हजार रुपए के आसपास ही थी, वे भी अब इस स्थिति के चलते विकल्पहीन हो गई हैं। आभूषण का क्षेत्र रोजगार के अंतर्गत असंगठित क्षेत्र में गिना जाता है और एकाएक आई इस दुविधा से कारीगरों पर इसकी मार पड़ने लगी है। इस क्षेत्र से रोजगार प्राप्त करने वालों के पास आर्थिक सुरक्षा के लिए न तो भविष्य निधि है और न ही बीमा जैसा कोई विकल्प।

वर्ष 2025 वैश्विक कूटनीति के चलते भारत के लिए बड़ा परेशानी वाला रहा क्योंकि शुरुआती दौर में अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों ने आर्थिक विकास की दर को प्रभावित करने की कोशिश की, लेकिन भारत सरकार ने समय रहते जीएसटी दरों में कमी करके उस आशंका को कुछ हद तक निराधार साबित कर दिया, जिसके परिणाम तीसरी तिमाही के आर्थिक आंकड़ों में जल्दी दिखेंगे। इन सबके बीच में एकाएक जनवरी 2026 की शुरुआत से ही चीन की ओर से चांदी के निर्यात पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध ने तो बड़ी समस्या खड़ी कर दी है। चीन के अलावा मेक्सिको भी चांदी का एक बड़ा उत्पादक राष्ट्र है लेकिन अमरीका की वैश्विक नीति के चलते मेक्सिको ने भी भारत के आयात पर पहले से ही कर की दर में बढ़ोतरी कर दी है।

कुल मिलाकर इसे एक तरह से वैश्विक कूटनीति का दबाव भी कहा जा सकता है और पूर्वानुमानों की कमी भी। अब इस पक्ष पर बहुत तेजी से सरकार के रुख का स्पष्ट होना अत्यंत आवश्यक है। अन्यथा असंगठित क्षेत्र के माध्यम से मिलने वाले एक बड़े रोजगार पर बड़ी मार पड़नी तय है। इन सबके चलते चांदी का व्यवसायी सरकार से जीएसटी की दर और अन्य वसूल किए जाने वाले टैक्स की दरों को तुरंत खत्म करने की आशा आने वाले बजट में रखता है ताकि मूल्यों में कुछ कमी हो। साथ ही चांदी की उपलब्धता के लिए अन्य विकल्पों पर भी काम करने की जरूरत है।

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As printed in राजस्थान पत्रिका.

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