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राजस्थान पत्रिका

पर्यटन क्षेत्र पर निर्भरता श्रीलंका को पड़ी भारी

सामयिक: हर देश को आत्मनिर्भरता पर देना होगा जोर

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इन दिनों पड़ोसी मुल्क श्रीलंका आर्थिक संकट के कारण विश्व भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। वह कोरोना की आर्थिक मार से उबरने की कोशिश ही कर रहा था कि विदेशी मुद्रा के भंडार में अत्यंत कमी के चलते पैदा हुए आर्थिक संकट ने वहां के नागरिकों की कमर तोड़ के रख दी है। सरकार अपने आपको विवश महसूस कर रही है। पूरे मुल्क में अशांति है। खाद्य पदार्थों की कमी के चलते उनकी उपलब्धता बाधित है। कच्चे तेल व बिजली की आपूर्ति में भयंकर कमी हो गई है। हालत यह है कि कागज की कमी के कारण विद्यार्थियों की परीक्षाएं निरस्त कर दी गई हैं। वहीं दूसरी तरफ हर पदार्थ के मूल्य कई गुना बढ़ गए हैं। महंगाई का आतंक साफ दिखाई दे रहा है। आर्थिक आपातकाल की घोषणा भी की गई, परंतु उसे कुछ दिनों बाद ही वापस ले लिया गया। कुल मिलाकर इस समस्या का निदान कैसे होगा, इसका कोई मार्ग अभी तो नहीं दिख रहा है।

अगर इतिहास के परिदृश्य से श्रीलंका के आर्थिक विकास को समझने की कोशिश करें, तो यह पाया जाएगा कि इस मुल्क में कभी भी आर्थिक नीतियों में लंबे समय तक एकरूपता नहीं रही है। भौगोलिक परिवेश के चलते इस मुल्क के आर्थिक स्रोतों में पर्यटन हमेशा से एक मुख्य स्रोत रहा है। आर्थिक संकट को अगर समझना है, तो यह ही सामने आता है कि पर्यटन क्षेत्र को बढ़ावा देने के उत्साह ने ही श्रीलंका को आज बदहाली की कगार पर खड़ा कर दिया है। इसी क्षेत्र के विकास के लिए अधिकाधिक विदेशी ऋण लिए गए। आंकड़ों के अनुसार 2026 तक श्रीलंका को 29 बिलियन अमरीकी डॉलर के बराबर विदेशी कर्ज का भुगतान करना ही होगा। इसी बीच कोरोना के चलते 2 वर्ष तक पर्यटन क्षेत्र पूरे विश्व में बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ, जिसने श्रीलंका को तो बहुत बड़ी चोट मारी। गौरतलब है कि चीनी पर्यटकों का पसंदीदा स्थान हमेशा श्रीलंका रहा है। कोरोना से पहले 1,67,863 चीनी यात्रियों ने वर्ष 2019 में श्रीलंका भ्रमण किया था, परंतु वर्ष 2020 से लेकर अब तक कोरोना के कारण चीन ने अपने नागरिकों पर श्रीलंका भ्रमण पर प्रतिबंध लगा रखा है। दूसरी तरफ श्रीलंका की बदकिस्मती यह भी है कि रूस और यूक्रेन दोनों श्रीलंका के पर्यटन क्षेत्र में बहुत बड़े भागीदार रहे हैं। एक रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष 11 फरवरी तक श्रीलंका भ्रमण के लिए गए कुल यात्रियों का 15.8 प्रतिशत भाग रूस का तथा 8 प्रतिशत से अधिक यूक्रेन का था। गत कुछ माह से दोनों के बीच शुरू हुए युद्ध से श्रीलंका का पर्यटन क्षेत्र बहुत लंबे समय तक प्रभावित रहेगा। इस हालत में यह भी गौर करना होगा कि वर्ष 2019 के शुरुआती दिनों में ईस्टर के दौरान श्रीलंका में एक विशेष समुदाय के धार्मिक स्थानों पर हुए आतंकी हमलों में कई विदेशी पर्यटक मारे गए थे, जिसके कारण श्रीलंका विश्व के दूसरे मुल्कों के लिए सुरक्षित मुल्क नहीं माना गया। वर्तमान में श्रीलंका की वित्तीय स्थिति ने तो निश्चित रूप से पर्यटन क्षेत्र की हालत को उजागर कर दिया है। यह सबक भी दिया है कि एक क्षेत्र पर निर्भरता घातक है।

वास्तविकता में श्रीलंका की यह समस्या वैश्वीकरण के इस दौर में एक बहुत बड़ी चुनौती है। निश्चित रूप से आने वाले दिनों में हर मुल्क आत्मनिर्भरता को ही बढ़ावा देना चाहेगा। दूसरे देशों पर अत्यधिक निर्भरता वैसे भी घातक ही होती है। विदेशी कर्ज के बल पर अपने मुल्क को विकास की राह पर ले जाने की बजाय अपने मुल्क में खुद की उद्यमिता को पैदा करना आज के दौर की सबसे बड़ी मांग है। श्रीलंका भी अगर अपने यहां समय रहते इस बात को समझता, तो शायद आज इस कगार पर नहीं खड़ा होता। अब प्रश्न यह है कि क्या आने वाले समय में श्रीलंका वापस अपनी विकास की राह को पकड़ पाएगा या नहीं? सवाल का जवाब तो भविष्य के गर्भ में ही छिपा हुआ है, लेकिन आशा की जानी चाहिए कि श्रीलंका संकट से मुक्ति पा जाएगा।

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As printed in राजस्थान पत्रिका.