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भारत में महंगाई का केंद्र भोजन क्यों है, पश्चिम में क्यों नहीं?

महंगाई दुनिया की हर अर्थव्यवस्था की समस्या है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी चोट हर देश में एक जगह नहीं पड़ती। भारत में महंगाई का सबसे संवेदनशील हिस्सा भोजन है, जबकि विकसित पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में महंगाई का बड़ा दबाव भोजन के बाहर दिखाई देता है। यह अंतर खानपान की आदत का नहीं, आय, उपभोग और आर्थिक विकास की संरचना का है।
भारत के 2023 से 2024 के घरेलू उपभोग सर्वेक्षण में ग्रामीण परिवारों के कुल उपभोग खर्च का 47.04 प्रतिशत और शहरी परिवारों का 39.68 प्रतिशत भोजन पर था। अमेरिका में 2024 में घरेलू खर्च में भोजन की हिस्सेदारी 12.9 प्रतिशत थी, जबकि आवास 33.4 प्रतिशत और परिवहन 17 प्रतिशत था।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर भारतीय अपनी आय का लगभग आधा हिस्सा भोजन पर खर्च करता है। भारत में आय बढ़ने के साथ भोजन पर खर्च की हिस्सेदारी घटती है। अतिरिक्त आय बेहतर आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन, मनोरंजन और दूसरी सेवाओं की ओर जाने लगती है।
यही वह आर्थिक संक्रमण है जो पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में काफी पहले हो चुका है। इसलिए भारत और पश्चिम का अंतर यह नहीं कि भारतीय भोजन को अधिक महत्व देते हैं। अंतर यह है कि भारत में बड़ी आबादी की आय अभी उस स्तर तक नहीं पहुंची है जहां भोजन के बाद दूसरी जरूरतों पर खर्च तेजी से बढ़ने लगे। पश्चिम में परिवार के बजट का बड़ा हिस्सा अब आवास और सेवाओं में जाता है, इसलिए महंगाई का दबाव भी वहीं अधिक दिखाई देता है।
लेकिन यहीं भारत का एक सबसे बड़ा आर्थिक विरोधाभास सामने आता है।
जब परिवार के बजट में भोजन इतना बड़ा है, तो भोजन पैदा करने वाला किसान उसी अनुपात में समृद्ध क्यों नहीं है?
इसका कारण है कि उपभोक्ता की कीमत और किसान की कीमत एक नहीं होती। खेत से उपभोक्ता तक पहुंचते पहुंचते परिवहन, भंडारण, छंटाई, प्रसंस्करण, व्यापार और खुदरा की कई परतें कीमत में जुड़ती हैं फलतः उपभोक्ता की जेब से निकली पूरी राशि किसान की आय नहीं बनती। इसीलिए महंगा टमाटर किसान की समृद्धि का प्रमाण नहीं है और महंगी दाल किसान की बढ़ी हुई आय का प्रमाण नहीं है। खुदरा कीमत बढ़ सकती है, लेकिन उत्पादक को उस वृद्धि का अनुपातिक लाभ मिले, यह जरूरी नहीं।
तेल महंगा होने पर
कच्चा तेल भारत और पश्चिम को जोड़ने वाला साझा वैश्विक कारक है। तेल महंगा होने पर भारत में परिवहन, उर्वरक, सिंचाई, पैकेजिंग और ढुलाई की लागत बढ़ती है और उसका असर खाद्य कीमतों तक बहुत अधिक पहुंचता है। पश्चिम में भी तेल महंगा होने से उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ती है। लेकिन वहां भोजन कुल घरेलू खर्च का छोटा हिस्सा है, इसलिए वही वैश्विक झटका आवास, परिवहन और सेवाओं की कीमतों में अधिक दिखाई देता है।
एक और कारण
भारत की खाद्य महंगाई की अपनी एक और भी कमजोरी है। मौसम, फसल, भंडारण और आपूर्ति में मामूली बदलाव भी सब्जियों जैसी वस्तुओं की कीमतों में बड़ा उछाल ला सकता है। यही कारण है कि भारत और पश्चिम की महंगाई को केवल खाद्य और गैर खाद्य के आंकड़ों से देखना पर्याप्त नहीं। भारत में महंगाई अभी जीवन की बुनियादी जरूरतों की कीमत से गहराई से जुड़ी है; पश्चिम में महंगाई अधिकतर उस जीवन की लागत से जुड़ी है जो बुनियादी जरूरतों से आगे निकल चुका है।
भारत जैसे जैसे समृद्ध होगा, भोजन पर खर्च की हिस्सेदारी घटेगी और आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा सेवाओं की हिस्सेदारी बढ़ेगी। भारत की महंगाई का चरित्र भी बदलेगा।