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जनसत्ता

यूपीआई शुल्क का असर और आशकाएँ

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यूपीआई शुल्क व्यापारी पर, क्या आम आदमी पर असर नहीं होगा?
अब यूपीआई पूरी तरह शुल्कमुक्त नहीं

डॉ. पी. एस. वोहरा
आर्थिक मामलों के जानकार एवं समाचार पत्रों में नियमित स्तंभकार

अब तक आम धारणा यही रही कि यूपीआई से भुगतान करना लगभग पूरी तरह मुफ्त है। लेकिन सरकार की नई व्यवस्था के बाद यह तस्वीर बदलने जा रही है। 15 अक्टूबर 2026 से सभी व्यापारी भुगतान पूरी तरह शुल्कमुक्त नहीं रहेंगे। हालांकि व्यक्ति से व्यक्ति होने वाले भुगतान पर कोई शुल्क नहीं होगा और 2,000 रुपये तक के व्यापारी भुगतान भी शुल्कमुक्त रहेंगे, लेकिन 2,000 रुपये से अधिक के कुछ व्यापारी भुगतानों पर शुल्क लागू होगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह शुल्क ग्राहक से अलग से नहीं लिया जाएगा और इसे कर भी नहीं माना जाएगा। फिर भी इस फैसले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि जिस यूपीआई को देश में डिजिटल भुगतान की सबसे बड़ी सार्वजनिक आधारभूत व्यवस्था के रूप में खड़ा किया गया, उसकी लागत का बोझ अब किस तरह और किस पर पड़ेगा?
यूपीआई की कहानी केवल शुल्क की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है जिसने भारत में भुगतान के तौर तरीके को ही बदल दिया। अप्रैल 2016 में यूपीआई की शुरुआत केवल 21 बैंकों के साथ हुई थी। अगस्त 2016 में इसके पहले महीने में करीब 90 हजार लेनदेन हुए। शुरुआत छोटी थी, लेकिन इसके बाद घटनाक्रम ने असाधारण गति पकड़ी।

नोटबंदी और कोरोना के बाद बदली भुगतान की तस्वीर
8 नवंबर 2016 को 500 और 1,000 रुपये के पुराने नोटों को चलन से बाहर करने की घोषणा हुई। इसके बाद नकदी की उपलब्धता अचानक सीमित हुई और डिजिटल भुगतान के लिए एक विशाल नया बाजार तैयार हुआ। पेटीएम जैसे डिजिटल भुगतान मंचों ने इस दौर में तेज वृद्धि दर्ज की। कंपनी ने उस समय अपने लेनदेन और उपयोगकर्ताओं में कई गुना बढ़ोतरी के दावे किए। यह वही दौर था जब डिजिटल भुगतान केवल सुविधा का विकल्प नहीं रहा, बल्कि रोजमर्रा के आर्थिक व्यवहार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने लगा। यूपीआई ने इसके बाद लगातार नई ऊंचाइयां छुईं। अक्टूबर 2019 में एक महीने में एक अरब से अधिक लेनदेन का आंकड़ा पार हुआ। फरवरी 2020 में लेनदेन करीब 1.32 अरब तक पहुंच गए। फिर कोरोना महामारी और देशव्यापी बंद ने लोगों के भुगतान व्यवहार को एक और बड़ा मोड़ दिया। अप्रैल 2020 में भी यूपीआई पर करीब एक अरब लेनदेन हुए। इसके बाद अक्टूबर 2020 में यह आंकड़ा दो अरब से ऊपर चला गया और दिसंबर 2020 में करीब 2.23 अरब लेनदेन दर्ज किए गए।
इसके बाद यूपीआई की वृद्धि और तेज होती गई। वित्त वर्ष 2025 से 26 में देश के कुल डिजिटल भुगतान लेनदेन में यूपीआई की हिस्सेदारी करीब 84 प्रतिशत तक पहुंच गई। जुलाई 2026 में ही यूपीआई पर करीब 23.66 अरब लेनदेन हुए, जिनका कुल मूल्य लगभग 29.88 लाख करोड़ रुपये रहा। यानी जिस व्यवस्था की शुरुआत कुछ हजार लेनदेन से हुई थी, वह कुछ ही वर्षों में लाखों करोड़ रुपये के मासिक आर्थिक प्रवाह का माध्यम बन गई।

यूपीआई की असली लागत
यूपीआई उपभोक्ता के लिए लगभग मुफ्त है, लेकिन इसे चलाना मुफ्त नहीं है। इसके पीछे सर्वर, तकनीकी ढांचा, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने की व्यवस्था, बैंकिंग नेटवर्क, ग्राहक सहायता और लगातार बढ़ते लेनदेन को संभालने की क्षमता पर भारी खर्च होता है। संसदीय वित्त संबंधी समिति के सामने रखे गए आंकड़ों के अनुसार यूपीआई के संचालन की अनुमानित वार्षिक लागत करीब 20,700 करोड़ रुपये है, जबकि वित्त वर्ष 2026 से 27 के लिए सरकार ने इसके लिए करीब 2,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।

विदेशी और निजी कंपनियां आगे, सरकारी तंत्र पीछे क्यों?
यूपीआई का ढांचा भारत ने बनाया, लेकिन उसका सबसे बड़ा बाजार निजी कंपनियों के हाथ चला गया। फोनपे और गूगल पे मिलकर करीब 80 प्रतिशत यूपीआई लेनदेन संभालते हैं। फोनपे में अमेरिकी कंपनी वालमार्ट की बड़ी हिस्सेदारी है और गूगल पे अमेरिकी कंपनी अल्फाबेट का हिस्सा है। दूसरी ओर, नोटबंदी के बाद तेजी से बढ़ा पेटीएम कुछ ही वर्षों में बड़े निजी डिजिटल भुगतान कारोबार में बदला और 2021 में अपना आईपीओ लाकर सूचीबद्ध कंपनी बन गया। जब डिजिटल भुगतान का आधार भारत ने बनाया, तो उसका बड़ा कारोबारी लाभ निजी और विदेशी पूंजी वाली कंपनियों के हिस्से में क्यों गया?
सरकार ने भीम बनाया, सार्वजनिक बैंकों के पास करोड़ों ग्राहक थे और एसबीआई ने योनो जैसा मंच खड़ा किया, फिर भी वे पीछे रह गए। एसबीआई अध्यक्ष सी. एस. शेट्टी ने खुद स्वीकार किया कि बैंक डिजिटल भुगतान की दौड़ में पीछे छूट गया है। जब ढांचा अपना था, ग्राहक अपना था और बैंक अपने थे, तो अपने मंच पीछे और निजी मंच आगे क्यों रहे?

शुल्क का असर केवल व्यापारी तक सीमित रहेगा?
नई व्यवस्था में 2,000 रुपये तक के व्यापारी भुगतान और छोटे व्यापारियों के लिए शुल्कमुक्त व्यवस्था जारी रहेगी। सरकार के अनुसार करीब 96 प्रतिशत व्यापारी लेनदेन इससे प्रभावित नहीं होंगे। लेकिन 2,000 रुपये से अधिक के कुछ निर्धारित व्यापारी भुगतानों पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगेगा, जिसमें 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन पर अधिकतम 300 रुपये की सीमा होगी। कुछ निर्धारित क्षेत्रों में प्रति लेनदेन 5 रुपये और पूंजी बाजार से जुड़े लेनदेन में 0.02 प्रतिशत, अधिकतम 300 रुपये तक का शुल्क प्रस्तावित है।
व्यापारी यह शुल्क सीधे ग्राहक से अलग से नहीं वसूल सकता। लेकिन आर्थिक व्यवहार इतना सीधा नहीं होता। व्यापारी व्यापारी इस लागत को किसी दूसरी लागत में समायोजित कर सकता है या भविष्य में कीमतों को बदलने पर विचार कर सकता है। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इससे महंगाई बढ़ेगी, लेकिन यह सवाल जरूर है कि लगातार बढ़ती डिजिटल भुगतान लागत का अंतिम आर्थिक भार आखिर किसके हिस्से में जाएगा। और इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या शुल्क लगने के बाद व्यापारी डिजिटल भुगतान को पहले जैसी सहजता से अपनाएंगे? यदि किसी भुगतान माध्यम को व्यापारी एक नियमित लागत के रूप में देखने लगे, तो क्या वह दूसरे भुगतान माध्यमों को प्राथमिकता देने की कोशिश नहीं करेगा? यही वह बिंदु है जहां 2016 की पूरी कहानी फिर सामने खड़ी हो जाती है।

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As printed in जनसत्ता.

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