जनसत्ता
सस्ते इंटरनेट से डेटा कारोबार तक: भारतीय दूरसंचार में आम आदमी के हित का सवाल
भारतीय दूरसंचार उपभोक्ता के सामने आज एक विचित्र स्थिति है। एक बड़ी विदेशी कंपनी भारतीय बाजार में इंटरनेट की सुविधा देने के लिए प्रवेश करना चाहती है, तो दूसरी ओर वो कंपनी अपने सोशल मीडिया पर अपने भारत में प्रवेश को लेकर अपने मुख्य भारतीय प्रतिस्पर्धी को लेकर सवाल उठाती है। ऐसे में भारतीय उपभोक्ता के मन में कुछ सीधे सवाल उठना स्वाभाविक है। पहला, कोई विदेशी उद्योगपति हमारे देश के उद्योगपति पर आरोप लगाने वाला कौन होता है? दूसरा, यदि उसकी कंपनी भारत में आती है, तो आम भारतीय को वास्तव में क्या इंटरनेट और सस्ता मिलेगा, क्या बेहतर सेवा मिलेगी? या भारत का टेलीकॉम सेक्टर में कंपनियाँ बाजार और मुनाफे के लिए लड़ेंगी, जबकि उपभोक्ता केवल ग्राहक बना रहेगा?
पिछले कुछ समय से देश में सस्ते इंटरनेट ने भारतीयों के जीवन में बड़ा बदलाव किया है। शिक्षा, मनोरंजन, बैंकिंग, भुगतान और खरीदारी पहले से अधिक सुलभ हुए हैं। ये भी आम राय है कि पहले मुफ़्त में बाँटकर आम आदमी को उसकी आदत लगायी गयी और मुफ़्त बाँटने की लागत को बैकहैंड से समूह की बड़ी कंपनी ने संभाला था। लेकिन ये आम-राय अब बहस में तब्दील होती जा रही है। समाज में अब बहुत प्रश्न हैं। ये भी आम सहमति है कि इंटरनेट की बढ़ी सुविधा के साथ कुछ नई समस्याएँ भी आई हैं। मात्र कम कीमत मिलने से उपभोक्ता का हित पूरा नहीं हुआ बल्कि वो नई ख़रीददारी और उसके उपभोग का मुख्य स्रोत गया है क्योंकि उसकी डिजिटल गतिविधियाँ, पसंद और व्यवहार कंपनियों के लिए कारोबारी जानकारी बनते जा रहे हैं। इससे वो इंटरनेट की सुविधा के माध्यम से अनजाने में अपने व्यवहार का ऐसा विवरण भी उपलब्ध करा रहा है, जिसका इस्तेमाल उसे ही अधिक खरीदारी के लिए प्रेरित करने में हो रहा है। जियो और स्टारलिंक की प्रतिस्पर्धा इसलिए केवल दो उद्योगपतियों की कारोबारी लड़ाई नहीं है। यह भारतीय उपभोक्ता के वास्तविक लाभ, उसकी आर्थिक स्थिति और उसकी निजता से जुड़ा प्रश्न भी है।
इस बहस का आर्थिक पक्ष भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इंटरनेट ने शिक्षा, मनोरंजन, भुगतान और व्यापार के नए अवसर पैदा किए हैं। भारत में इंटरनेट का विस्तार नई सदी के आरंभ से हुआ, लेकिन वर्ष 2016 में जियो के प्रवेश ने दूरसंचार बाजार की तस्वीर बदल दी। आरंभिक मुफ्त सेवाओं ने इंटरनेट को देश की बड़ी आबादी तक पहुँचाया। इसके बाद घरेलू बाजार में तीव्र प्रतिस्पर्धा ने डेटा की कीमतें घटाईं और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा दिया। नोटबंदी के बाद डिजिटल भुगतान का चलन बढ़ा, जबकि कोरोना महामारी ने ऑनलाइन शिक्षा, घर से काम और ऑनलाइन खरीदारी को व्यापक रूप से स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2022 से 2023 में भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का आकार 31.64 लाख करोड़ रुपये था, जो राष्ट्रीय आय का 11.74 प्रतिशत था। आईएमएआरसी के अनुमान के अनुसार, भारत का ऑनलाइन शिक्षा बाजार वर्ष 2025 में 3.64 अरब अमेरिकी डॉलर का था। मोर्डोर इंटेलिजेंस ने भारतीय ओटीटी बाजार का आकार इसी वर्ष 9.45 अरब अमेरिकी डॉलर आँका। डिजिटल भुगतान में बदलाव का पैमाना भी विशाल है। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम के अनुसार, सितंबर 2026 में यूपीआई के माध्यम से 24.07 अरब लेनदेन हुए, जिनका कुल मूल्य लगभग 29.37 लाख करोड़ रुपये था।
लेकिन इन आँकड़ों के आधार पर कुछ बुनियादी प्रश्न उठते हैं। क्या डिजिटल अर्थव्यवस्था का बढ़ता कारोबार आम परिवार की आय और बचत भी बढ़ा पाया है? क्या आसान खरीदारी और छूट के आकर्षक प्रस्तावों ने लोगों को अधिक खर्च करने के लिए प्रेरित किया है? क्या ऑनलाइन शिक्षा से पढ़ाई सस्ती हुई है? क्या ऑनलाइन खरीदारी से छोटे उद्यमियों की शुद्ध आय बढ़ी है? क्या ओटीटी सदस्यताओं ने परिवारों का कुल खर्च बढ़ाया है?
डिजिटल सुविधा अपने आप में समस्या नहीं है, लेकिन जब वह उपभोग बढ़ाने का माध्यम बन जाए, तो सवाल पूछना जरूरी है। एक क्लिक पर खरीदारी, व्यक्तिगत पसंद के अनुसार दिखाए जाने वाले विज्ञापन और सीमित समय के प्रस्ताव लोगों को ऐसी वस्तुएँ खरीदने के लिए प्रेरित कर सकते हैं, जिनकी उन्हें तत्काल आवश्यकता नहीं होती। आय में वृद्धि के बिना खर्च बढ़ता है, तो बचत प्रभावित हो सकती है। महँगाई, रोजगार, कर्ज और घरेलू जरूरतें भी बचत को प्रभावित करती हैं, इसलिए डिजिटल सेवाओं को इसका एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। फिर भी यह पूछना उचित है कि डिजिटल बाजार नागरिक की वित्तीय समझ और स्वतंत्र निर्णय क्षमता को मजबूत कर रहा है या उसे अधिक उपभोग की ओर धकेल रहा है। कारोबार और लेनदेन में वृद्धि आर्थिक गतिविधियों का संकेत है, लेकिन अपने आप में यह समाज या आम आदमी की आर्थिक समृद्धि का प्रमाण नहीं है।
निजी व्याहार के आकंडों का प्रश्न इस बहस को और गंभीर बनाता है। नागरिक इंटरनेट पर क्या खोजता है, कौन सी सामग्री देखता है, कहाँ खरीदारी करता है और किस विज्ञापन पर प्रतिक्रिया देता है, यह सब बाजार के लिए मूल्यवान जानकारी बन चुका है। कंपनियाँ इस जानकारी से ग्राहक की पसंद समझती हैं, उसके व्यवहार का अनुमान लगाती हैं और उसी के अनुरूप उत्पाद तथा लक्षित विज्ञापन तैयार करती हैं। ऐसे में क्या नागरिक को पता है कि इंटरनेट का उपयोग करते समय उसकी कौन कौन सी जानकारियाँ एकत्र की जाती हैं, उन्हें कहाँ साझा किया जाता है और किस उद्देश्य से इस्तेमाल किया जाता है?
यदि नागरिक की डिजिटल गतिविधियाँ कंपनियों को अधिक सटीक विपणन और अधिक मुनाफा कमाने में मदद करती हैं, तो क्या उसे यह जानने और तय करने का वास्तविक अधिकार नहीं होना चाहिए कि उसकी जानकारी का उपयोग कैसे किया जाए? कई लोगों को अनुभव होता है कि किसी विषय पर बातचीत करने के बाद उसी से संबंधित विज्ञापन मोबाइल पर दिखाई देने लगते हैं। यह अनुभव अपने आप साबित नहीं करता कि मोबाइल बातचीत सुन रहा है। खोज, क्लिक, स्थान संबंधी अनुमतियाँ और पिछली डिजिटल गतिविधियाँ भी विज्ञापनों को प्रभावित कर सकती हैं। फिर भी डेटा संग्रह, उसके उपयोग और उसे साझा करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता अनिवार्य है।
आज नागरिक की डिजिटल गतिविधियों का कारोबारी मूल्य है, लेकिन उस मूल्य के निर्माण में उसकी भूमिका और उसके अधिकारों पर गंभीर चर्चा आवश्यक है। वह अपनी आय से सेवाएँ खरीदता है और अपने व्यवहार से कंपनियों को बाजार संबंधी महत्त्वपूर्ण जानकारी देता है। उसकी डिजिटल गतिविधियों से पैदा होने वाले आर्थिक मूल्य का बड़ा हिस्सा कारोबारी संस्थाओं को मिल सकता है, जबकि नागरिक की भूमिका केवल ग्राहक तक सीमित रह जाती है। यह प्रश्न केवल निजता का नहीं, बल्कि आर्थिक विकास के लाभों के वितरण का भी है। यदि बड़ी कंपनियाँ नागरिक के व्यवहार और उसकी जरूरतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर अपना कारोबार बढ़ाती हैं, तो यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि इस प्रक्रिया में नागरिक के अधिकार कमजोर न पड़ें और आर्थिक असमानता बढ़ाने वाली प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन न मिले।
जियो का प्रस्तावित आईपीओ इस बहस को एक और आयाम देता है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, आईपीओ के जरिए लगभग 30,213 करोड़ रुपये जुटाए जाने की संभावना है और कंपनी का संभावित मूल्यांकन करीब 10.3 लाख करोड़ रुपये है। प्रस्तावित ऊपरी मूल्य 1,119 रुपये प्रति शेयर होने पर 13 शेयरों का एक लॉट 14,547 रुपये का होगा। रिपोर्ट के अनुसार, आईपीओ से जुटाई गई राशि का बड़ा हिस्सा रिलायंस जियो इन्फोकॉम की उधारी चुकाने में इस्तेमाल किया जा सकता है।
यहाँ प्रश्न केवल निवेश का नहीं है। क्या इस आईपीओ में निवेश करने वाले आम आदमी की बचत को उचित प्रतिफल मिल सकेगा? क्या कंपनी का मूल्यांकन उसकी भविष्य की कमाई के अनुरूप है? क्या आईपीओ के बाद कर्मचारियों को बेहतर वेतन और सुरक्षित रोजगार मिलेंगे? क्या निवेशकों को कंपनी की वृद्धि के अनुरूप प्रतिफल मिलेगा? क्या ग्राहकों को तकनीकी प्रगति का लाभ उचित कीमतों के रूप में प्राप्त होगा? इसलिए इस आईपीओ का मूल्यांकन केवल लोकप्रियता से नहीं, बल्कि भविष्य की कमाई, उचित मूल्यांकन, जोखिम और पारदर्शिता के आधार पर होना चाहिए।
इंटरनेट ने जीवन को आसान बनाया है, पर उसकी सफलता तभी सार्थक होगी जब देश की डिजिटल व्यवस्था में भारतीय नागरिक को यह भरोसा हो कि उसकी जानकारी केवल इसलिए कारोबारी संसाधन नहीं बन जाएगी कि वह इंटरनेट का उपयोग करता है। उसे यह जानने और नियंत्रित करने का अधिकार होना चाहिए कि उसकी जानकारी का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है और क्या उसे अन्य कारोबारी संस्थाओं के साथ साझा किया जा रहा है। इसलिए अब डिजिटल क्रांति का अगला चरण केवल अधिक डेटा, अधिक लेनदेन और अधिक मुनाफे का नहीं, बल्कि नागरिक के अधिकारों की वास्तविक सुरक्षा का होना चाहिए।