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Society

बैंक कर्मचारी पांच दिन काम, दो दिन छुट्टी के लिए हड़ताल पर। नारायण मूर्ति 72 घंटे के पक्ष में। भारत में इतना विरोधाभास क्यों?

25 September 2026

भारत को अधिक काम चाहिए या अधिक उत्पादक काम?

भारत में काम की संस्कृति को लेकर एक बड़ा विरोधाभास सामने है। बैंक कर्मचारी सप्ताह में पांच दिन काम की मांग को लेकर 11 सितंबर को एक दिन की हड़ताल कर चुके हैं और 28 से 30 सितंबर तक फिर तीन दिन की हड़ताल प्रस्तावित है। दूसरी ओर प्रसिद्ध उद्योगपति और इन्फोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति भारत की आर्थिक प्रगति के लिए 70 से 72 घंटे काम करने की बात कर चुके हैं और चीन के 9 9 6 मॉडल का उदाहरण देते हैं। एक तरफ पांच दिन, दूसरी तरफ 72 घंटे।

पांच दिन की मांग के पक्ष में

बैंक कर्मचारियों की मांग को केवल अधिक छुट्टी की इच्छा कहना उचित नहीं। बैंकिंग अब केवल काउंटर पर लेनदेन तक सीमित नहीं है। ऋण वसूली, अनुपालन, साइबर अपराध, ग्राहक शिकायतें, लक्ष्य और प्रशासनिक जिम्मेदारियां कार्यभार बढ़ा रही हैं। यदि पांच दिन का सप्ताह कर्मचारी को बेहतर विश्राम देता है और कम दिनों में अधिक केंद्रित तथा प्रभावी काम संभव होता है, तो मांग में तर्क है। अधिक घंटे अपने आप अधिक उत्पादकता नहीं देते।

लेकिन वित्तीय समावेशन का सवाल

दूसरी ओर बैंक पहले से ही दूसरे और चौथे शनिवार को बंद रहते हैं। भारत में वित्तीय समावेशन अभी पूरा नहीं हुआ है। ग्रामीण ग्राहक, बुजुर्ग, छोटे व्यापारी और डिजिटल रूप से कम सक्षम लोग आज भी शाखाओं पर निर्भर हैं। डिजिटल बैंकिंग बढ़ी है, लेकिन हर ग्राहक डिजिटल बैंकिंग पर निर्भर नहीं हो सकता। इसलिए सभी शनिवारों को बंद करने का निर्णय केवल कर्मचारी सुविधा का प्रश्न नहीं है। 

कर्मचारी के लिए पांच दिन का सप्ताह तभी उचित है, जब ग्राहक के लिए बैंकिंग सुविधा मात्र पांच दिन की न हो। यदि डिजिटल सेवाएं, बैंकिंग प्रतिनिधि और अन्य माध्यम शाखा आधारित सेवाओं की कमी को पूरा कर सकें और वित्तीय समावेशन प्रभावित न हो, तो पांच दिन का सप्ताह व्यावहारिक हो सकता है। लेकिन यदि ग्राहक की पहुंच घटती है, तो केवल कर्मचारी सुविधा के आधार पर इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता।

72 घंटे का दूसरा छोर

नारायण मूर्ति का 72 घंटे का विचार इस बहस को दूसरा छोर देता है। उन्होंने चीन के 9 9 6 मॉडल का उदाहरण दिया है, जिसमें सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक, सप्ताह में छह दिन काम किया जाता है। फिर भी मूल प्रश्न महत्वपूर्ण है: क्या लंबे घंटे ही उत्पादकता हैं?

तनाव की सीमा भी महत्वपूर्ण है

2023 में इंडिगो के पायलट मनोज सुब्रमण्यम नागपुर हवाईअड्डे पर पुणे की उड़ान से पहले अचानक बेहोश हुए और उनकी मृत्यु हो गई। प्रारंभिक चिकित्सकीय जानकारी में हृदयाघात का उल्लेख था। लेकिन घटना एक महत्वपूर्ण बात जरूर याद दिलाती है काम की तीव्रता, विश्राम और मानवीय क्षमता का संतुलन भी महत्वपूर्ण है। थकान उत्पादकता का प्रमाण नहीं है और अवकाश अक्षमता का प्रमाण नहीं है।

असली बहस घंटे नहीं, उत्पादकता की है।

भारत की अगली आर्थिक छलांग इस बात से तय नहीं होगी कि उसके लोग कितने घंटे काम करते हैं। असली प्रश्न यह है कि वे उन घंटों में कितना मूल्य पैदा करते हैं, कितनी गुणवत्ता देते हैं और कितने लंबे समय तक प्रभावी रह सकते हैं।

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