ब्रिक्स की बढ़ती ताकत, लेकिन अभी डॉलर को चुनौती नहीं

ब्रिक्स द्वारा अमेरिकी डॉलर के वैश्विक वर्चस्व को चुनौती देने की चर्चा लगातार तेज हो रही है, लेकिन आर्थिक आंकड़े फिलहाल इस दावे का समर्थन नहीं करते। वर्ष 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ ब्रिक के रूप में शुरू हुआ यह समूह, दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद 2010 में ब्रिक्स बना। तब से इसके सदस्यों के बीच आर्थिक संबंधों में असाधारण विस्तार हुआ है। आपसी निर्यात लगभग 335 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 11,197 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया है।
आपसी लेनदेन में केवल 4 प्रतिशत अपनी मुद्राओं में, फिर डॉलर को चुनौती कैसे?
वर्ष 2025 में ब्रिक्स देशों के बीच केवल करीब 4 प्रतिशत आपसी व्यापार का निपटान राष्ट्रीय या आपसी सहमति वाली मुद्राओं में होने की बात सामने आई है। जब आपसी व्यापार का इतना छोटा हिस्सा ही डॉलर से बाहर हो रहा है, तो फिर वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने का दावा कितना वास्तविक है?
यही सबसे बड़ा विरोधाभास है। ब्रिक्स का आपसी व्यापार कई गुना बढ़ा है, लेकिन डॉलर से दूरी उसी अनुपात में नहीं बनी। आपसी व्यापार में अपनी मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ाना संभव है, लेकिन इसे डॉलर के वैश्विक विकल्प के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगी।
डॉलर का वर्चस्व केवल व्यापार से तय नहीं होता
डॉलर की वैश्विक शक्ति केवल ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार में उसके इस्तेमाल पर निर्भर नहीं है। अंतरराष्ट्रीय वित्त, विदेशी मुद्रा भंडार, बैंकिंग, निवेश, वस्तु बाजार और सीमा पार वित्तीय ढांचे में उसकी गहरी पकड़ है।
डॉलर के वर्चस्व को वास्तविक चुनौती देने के लिए ब्रिक्स को केवल राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने से कहीं आगे जाना होगा। इसके लिए गहरे और तरल वित्तीय बाजार, मुद्रा परिवर्तनीयता, व्यापक अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता और भरोसेमंद वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था की आवश्यकता होगी।
ब्रिक्स की चुनौती अभी सीमित है
ब्रिक्स निश्चित रूप से डॉलर पर निर्भरता को कुछ हद तक कम कर सकता है। राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों का विस्तार इसकी दिशा में कदम हो सकता है। लेकिन डॉलर पर निर्भरता कम करना और डॉलर के वैश्विक वर्चस्व को चुनौती देना एक ही बात नहीं है।
आंकड़े फिलहाल स्पष्ट संकेत देते हैं: ब्रिक्स की आर्थिक ताकत तेजी से बढ़ी है, लेकिन उसकी मौद्रिक शक्ति अभी डॉलर के वैश्विक वर्चस्व को चुनौती देने के स्तर तक नहीं पहुंची है।