E20 : ऊर्जा सुरक्षा की कीमत कहीं आम आदमी तो नहीं चुका रहा?

भारत के लिए कच्चे तेल का आयात एक बड़ी आर्थिक चुनौती है। हम अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करते हैं और हर वर्ष लगभग 120 से 140 अरब डॉलर विदेशी मुद्रा इस पर खर्च होती है। ऐसे में पेट्रोल में एथेनॉल का मिश्रण बढ़ाकर तेल का आयात कम करना, विदेशी मुद्रा बचाना और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना एक स्वाभाविक आर्थिक प्रयास है। भारत आज अमेरिका और ब्राजील के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा एथेनॉल उत्पादक और उपभोक्ता है। किसानों के लिए गन्ने और मक्के का एक अतिरिक्त बाजार तैयार होना भी इसका सकारात्मक पक्ष है।
लेकिन किसी भी नीति को केवल उसके उद्देश्य से नहीं, उसके कुल प्रभाव से समझना चाहिए। E20 के साथ अब एक दूसरा प्रश्न भी सामने आ रहा है। एथेनॉल उत्पादन में गन्ने और मक्के का उपयोग बढ़ रहा है। गन्ना चीनी उत्पादन से जुड़ा है और मक्का खाद्य उपयोग के साथ पशु आहार का भी महत्वपूर्ण स्रोत है। इसलिए यदि इन फसलों का अधिक हिस्सा एथेनॉल की ओर जाता है, तो क्या इसका असर चीनी, पशु आहार और आगे चलकर दूध जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है? आज आम व्यक्ति इन कीमतों का दबाव अपनी जेब में महसूस कर रहा है।
यहीं मेरा सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है:
जब हमारा लक्ष्य कच्चे तेल के आयात पर होने वाला भारी खर्च कम करना है, तो क्या E20 के लिए आवश्यक एथेनॉल का कुछ हिस्सा आयात करके ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा के बीच बेहतर संतुलन बनाना अधिक समझदारी भरा विकल्प नहीं होता?
यदि एथेनॉल का एक सीमित हिस्सा आयात किया जाता और बाकी घरेलू उत्पादन से पूरा होता, तो E20 का लक्ष्य भी जारी रह सकता था और घरेलू गन्ने तथा मक्के पर एथेनॉल उत्पादन का पूरा दबाव भी नहीं आता। खासकर मक्का के मामले में यह प्रश्न महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसका उपयोग पशु आहार में भी होता है।
भारत के लिए कच्चे तेल की बचत निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन हमें यह भी स्पष्ट रूप से जानना चाहिए कि E20 से वास्तव में कितने डॉलर का कच्चा तेल आयात बच रहा है और उसके लिए घरेलू गन्ने तथा मक्के के बढ़ते उपयोग का खाद्य कीमतों पर कितना प्रभाव पड़ रहा है। यदि हम केवल तेल की बचत गिनेंगे और खाद्य महँगाई की लागत को अलग रख देंगे, तो आर्थिक तस्वीर अधूरी रहेगी।
E20 की वास्तविक सफलता तभी मानी जानी चाहिए, जब इससे कच्चे तेल का आयात घटे, किसान को लाभ मिले, लेकिन उस लाभ की कीमत सामान्य भारतीय परिवार की रसोई और जेब को अत्यधिक महँगी न पड़े।