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वेल्थ क्रिएशन का निजीकरण, वेलफेयर का सरकारीकरण। 

क्या दुनिया ‘निजी सामंतवाद’ के नए युग में प्रवेश कर रही है?

3 September 2026

बीसवीं सदी की सबसे बड़ी आर्थिक पहचान यह थी कि सरकारें केवल शासन नहीं करती थीं, बल्कि राष्ट्र की सबसे बड़ी वेल्थ क्रिएटर भी होती थीं। बड़े उद्योग, सार्वजनिक उपक्रम, इस्पात संयंत्र, बैंक, दूरसंचार नेटवर्क, बिजली परियोजनाएँ, वैज्ञानिक संस्थान और राष्ट्रीय अवसंरचना, इन सबका निर्माण सरकारें करती थीं। वे ही रोजगार पैदा करती थीं, वे ही विज्ञान और अनुसंधान में निवेश करती थीं और वे ही उस संपत्ति का सामाजिक पुनर्वितरण भी करती थीं। लेकिन इक्कीसवीं सदी में यह आर्थिक दर्शन चुपचाप बदल चुका है। 

आज दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक परिवर्तन सरकार और निजी पूंजी के बीच बदलता हुआ शक्ति-संतुलन है। सरकारें धीरे-धीरे धन के सृजनकर्ता से धन के पुनर्वितरक बनती दिखाई दे रही हैं, जबकि पूंजी निर्माण, तकनीकी नवाचार, रोजगार और भविष्य की अर्थव्यवस्था का नेतृत्व निजी क्षेत्र के हाथों में केंद्रित होता जा रहा है। 

अमेरिका को देखिए। दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और तकनीकी शक्ति होने के बावजूद आज अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्लाउड कंप्यूटिंग, उन्नत सेमीकंडक्टर, डिजिटल प्लेटफॉर्म और वैश्विक डेटा अर्थव्यवस्था का नेतृत्व सरकार नहीं, बल्कि निजी कंपनियाँ कर रही हैं। उसकी इस नीति के कारण आज एआई की वैश्विक दौड़ देशों के बीच कम और कुछ निजी तकनीकी कंपनियों के बीच अधिक दिखाई देती है। इससे पहले कंप्यूटर और इंटरनेट की पूरी कमान पिछले चार दशकों से मैक्रोसॉफ़्ट से गूगल के पास रही। क्या ये कहना ग़लत होगा कि अमेरिका ने प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में निजी सामंतवाद को हमेशा प्रतिष्ठित किया और उसके बाद ये चलन हर देश तक पहुँचा।  

इन सब से भारत भी अछूता नहीं रहा। 2G से लेकर 5G तक की पूरी दूरसंचार क्रांति का नेतृत्व निजी क्षेत्र ने किया। आज करोड़ों भारतीय जिस डिजिटल नेटवर्क का उपयोग करते हैं, उसका विस्तार मुख्यतः निजी निवेश से हुआ है। यही स्थिति नवीकरणीय ऊर्जा की है, जहाँ सबसे बड़े निवेश निजी कंपनियाँ कर रही हैं। हवाई अड्डे, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स, डेटा सेंटर, औद्योगिक कॉरिडोर और अन्य बड़े अवसंरचनात्मक क्षेत्रों में भी निजी पूंजी निर्णायक भूमिका निभा रही है। यह संयोग नहीं है कि जिन क्षेत्रों से आने वाले दशकों में सबसे अधिक आर्थिक मूल्य और लाभ उत्पन्न होने की संभावना है, उन्हीं क्षेत्रों में निजी क्षेत्र सबसे अधिक सक्रिय है। इसके अलावा आज बीएसई सेंसेक्स की 30 कंपनियों में सार्वजनिक क्षेत्र की केवल दो कंपनियाँ एसबीआई और एनटीपीसी ही शामिल हैं। निफ्टी-50 में भी सार्वजनिक क्षेत्र की उपस्थिति केवल पाँच कंपनियों तक ही सीमित है। यह केवल शेयर बाज़ार का आँकड़ा नहीं है। इसका अर्थ यह है कि भारत की सूचीबद्ध अर्थव्यवस्था का अधिकांश बाजार मूल्य, निवेश और भविष्य का पूंजी निर्माण निजी क्षेत्र के हाथों में है। यदि कोई सामान्य भारतीय निवेशक देश की शीर्ष कंपनियों में निवेश करता है, तो उसका अधिकांश निवेश निजी कंपनियों में जाता है। अर्थात भारत की भविष्य की संपत्ति अब मुख्यतः निजी पूंजी बना रही है। यह बदलाव केवल शेयर बाज़ार तक सीमित नहीं है। 

चीन इस बहस में एक अलग मॉडल प्रस्तुत करता है। उसने भी अलीबाबा, टेनसेंट और अन्य निजी कंपनियों को वैश्विक स्तर तक बढ़ने दिया, लेकिन जब सरकार को लगा कि निजी कॉरपोरेट शक्ति अत्यधिक प्रभावशाली हो रही है, तब उसने कड़े नियामकीय हस्तक्षेप किए। अलीबाबा पर कार्यवाही और उसके संस्थापक जैक मा का लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन से लगभग गायब रहना इस बात का संकेत था कि चीन में अंतिम शक्ति का केंद्र राज्य ही है। 

यहीं से अब लोकतंत्र की बदलती प्राथमिकताएँ भी दिखाई देती हैं। सरकारों का ध्यान लगातार सामाजिक पुनर्वितरण की ओर बढ़ रहा है। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, मुफ्त राशन, महिला वित्तीय सहायता, छात्रवृत्तियाँ, स्वास्थ्य बीमा, पेंशन और अन्य कल्याणकारी योजनाएँ लोकतांत्रिक राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं। हालाँकि इन योजनाओं की आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता। कमजोर वर्गों की सुरक्षा किसी भी लोकतांत्रिक राज्य की जिम्मेदारी है। परंतु लोकतंत्र में आजकल ये लोकप्रिय सरकार बनने का एक मुखोटा भी बनता जा रहा है।  

इसी संदर्भ में आर्थिक दृष्टि से एक दूसरा प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि राज्य विकास के लिए आधारभूत सरंचना के निर्माण की जिम्मेदारी में पूर्ण रूप से केंद्रित नहीं रहे। वित्तीय वर्ष 2026-27 में राज्यों का संयुक्त पूंजीगत व्यय लगभग 10.45 लाख करोड़ निर्धारित किया गया, किंतु शुरुआती अवधि में उसका लगभग 10 प्रतिशत ही उपयोग हो पाया। दूसरी ओर, पुनर्वितरण आधारित योजनाओं का दायरा लगातार बढ़ रहा है। यह किसी योजना की आलोचना नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं का प्रश्न है। यदि पूंजी निर्माण की गति अपेक्षाकृत धीमी रहे और विकास का अधिकांश निवेश निजी क्षेत्र करता रहे, तो धीरे-धीरे सरकार की भूमिका विकासकर्ता से पुनर्वितरक की ओर स्थानांतरित होती दिखाई दे सकती है। इस मॉडल का एक प्रभाव रोजगार पर भी पड़ता है। एक समय सार्वजनिक क्षेत्र रोजगार का प्रमुख स्रोत था। आज रोजगार का भविष्य तेजी से निजी निवेश पर निर्भर होता जा रहा है। इसका अर्थ है कि रोजगार सृजन की गति भी बाजार और कॉरपोरेट निवेश के निर्णयों से अधिक प्रभावित होगी। आर्थिक वृद्धि और रोजगार के बीच संतुलन बनाए रखना इसीलिए और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है।