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विकास में संतुलन पर अनिश्चितता

जनसत्ता| 5 जुलाई, 2026

वित्तीय वर्ष 2025-26 के परिणामों ने वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी देश की आर्थिक क्षमता पर विश्वास को मजबूत किया है। मार्च 2026 को समाप्त आखिरी तिमाही में लगभग 7.8 फीसद की विकास दर दर्ज होना केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उस आर्थिक लचीलेपन का प्रमाण है, जिसने अप्रत्याशित अमेरिकी शुल्क की अधिकतम दरों और फिर अमेरिका-इजराइल तथा ईरान युद्ध के बावजूद स्थिति को संभाले रखा। इन दोनों परिस्थितियों ने ऊर्जा संकट और वित्तीय निवेश संबंधी चिंताओं को बढ़ा दिया और यह स्थिति वर्तमान समय तक बनी हुई है। इन वैश्विक झटकों के बाद भी अगर भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपने विकास की गति को बनाए रखा है, तो यह आर्थिक नीतियों में भावी संभावनाओं के मद्देनजर किए गए बदलावों का असर हो सकता है। जैसे-जीएसटी दरों को तर्कसंगत बनाना और विभिन्न विकसित देशों के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते। मगर इन सब प्रयासों के बीच कुछ ऐसे प्रश्न भी उभर रहे हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सकारात्मक तस्वीर

देश की सकारात्मक तस्वीर को और मजबूती भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की हाल की मौद्रिक नीति समीक्षा से भी मिली है। आरबीआई ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए आर्थिक गतिविधियों को अनावश्यक दबाव से बचाने का प्रयास किया है। बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद रेपो दर को 5.25 फीसद पर स्थिर रखना ये संकेत देता है कि केंद्रीय बैंक केवल महंगाई को नहीं, बल्कि व्यक्ति के हाथ में वित्तीय तरलता की आवश्यकताओं को भी समान महत्त्व दे रहा है। विशेष रूप से ऐसे समय में जब पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में लगातार वृद्धि ने घरेलू बजट और व्यावसायिक लागतों पर दबाव बढ़ाया है। यह निर्णय अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्त्वपूर्ण सहारा माना जा सकता है।

आरबीआइ की ओर से विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के उद्देश्य से सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश पर पूंजीगत लाभ कर से संबंधी सौ फीसद राहत का निर्णय भी नीतिगत दृष्टि से बहुत उल्लेखनीय माना जाना चाहिए। इससे अनुमानित पचास अरब डालर तक की विदेशी पूंजी भारतीय ऋण बाजार की ओर आकर्षित होगी। यह केवल निवेश का प्रवाह नहीं होगा, बल्कि रुपए की स्थिरता, विदेशी मुद्रा भंडार की मजबूती और दीर्घकालिक वित्तीय संतुलन की दिशा में भी एक अहम कदम साबित हो सकता है। आरबीआइ के ये कदम यकीनन आने वाले वर्षों में रुपए के मूल्य में स्थिरता के लिए बहुत मजबूत नींव का काम करेंगे।

सवाल भी उभरे

देश की अर्थव्यवस्था को लेकर सकारात्मक आंकड़ों और नीतिगत प्रयासों के बीच कुछ ऐसे सवाल भी उभर रहे हैं, जिन पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। मसलन, फरवरी 2026 में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और बाद में अमेरिका-इजराइल तथा ईरान के बीच संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को प्रभावित किया। युद्ध से पहले लगभग साठ डालर प्रति बैरल के आसपास रहने वाला कच्चा तेल बढ़कर लगभग 110 डालर प्रति बैरल तक पहुंच गया। परिणामस्वरूप इसने देश का आयात खर्चा बढ़ा दिया और उससे चालू खाता घाटा भी बढ़ेगा। वर्तमान समय के अनुमानों के अनुसार, इसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 1.50 फीसद तक पहुंचने की संभावना बन गई है, जिसे बजट में सरकार ने 0.50 फीसद के आसपास माना था। इसी कारण सरकार ने देश के नागरिकों को तेल का कम उपयोग करने तथा सोने की खरीद से एक साल तक परहेज करने की सलाह दी। फिर एकाएक सोने पर सीमा शुल्क ग्यारह फीसद कर दिया और अब तक चार दफा पेट्रोल-डीजल के मूल्यों में बढ़ोतरी की। हालांकि यह बढ़ोतरी अभी तक दस रुपए प्रति लीटर से कम ही है, पर घरेलू गैस सिलंेडर के मूल्यों में एक बार 29 रुपए और फिर 60 रुपए भी बढ़ाए गए, जो महंगाई के रूप में आम जनता को प्रभावित कर रहा है।

इसके अलावा, सबसे ज्यादा प्रभाव भारतीय रुपए पर पड़ा है। अप्रैल, 2025 में लगभग 85 रुपए प्रति डालर के स्तर पर रहने वाली मुद्रा एक वर्ष के भीतर करीब 96 रुपए प्रति डालर तक पहुंच गई। लगभग तेरह फीसद की यह कमजोरी पिछले कई दशकों में देखे गए रुपए के प्रमुख अवमूल्यनों में से एक मानी जा सकती है। यही कारण है कि मजबूत विकास दर के बावजूद भारत की गिनती पुनः विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में की जाने लगी है। रुपए की कमजोरी को आरबीआइ ने भी स्वीकार किया है। इसी वजह से चालू वित्तीय वर्ष के लिए महंगाई का अनुमान 4.6 फीसद से बढ़ाकर पांच फीसद से अधिक कर दिया गया है, जबकि विकास दर का अनुमान 6.9 फीसद से घटाकर 6.6 फीसद कर दिया गया है।

विदेशी पूंजी की निकासी

एक अन्य चिंता का विषय भारतीय पूंजी बाजार से विदेशी निवेशकों द्वारा लगातार बड़े पैमाने पर धन निकासी को लेकर है। विशेष रूप से देश का सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र बहुत अधिक दबाव में दिखाई दे रहा है। इसका मुख्य कारण है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) आधारित वैश्विक कंपनियों के तेजी से उभरने और निवेशकों की बदलती प्राथमिकताओं ने भारतीय प्रौद्योगिकी कंपनियों के मूल्यांकन पर बहुत असर डाला है। वर्तमान में भारत का निफ्टी आइटी सूचकांक बाईस फीसद से अधिक गिर चुका है। ये कमजोरी केवल बाजार का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि एआइ के क्षेत्र में तकनीकी प्रतिस्पर्धा के बदलते वैश्विक परिदृश्य का संकेत भी है। एक अन्य महत्त्वपूर्ण संकेत देश के बैंकिंग क्षेत्र से सामने आया है। पांच करोड़ रुपए से अधिक की जमा, भारतीय बैंकिंग की कुल बैंक जमा का लगभग एक-तिहाई हिस्सा हो गई हैं, जबकि पचास लाख से एक करोड़ रुपए से अधिक के जमा खातों का हिस्सा अभी पैंतालीस फीसद से भी अधिक है। निश्चित तौर पर ऐसा बैंकिंग में इन बड़ी जमा रकमों के लिए उच्च ब्याज दरों के कारण हुआ है।

निवेश बनाम बचत

आज बड़े जमाकर्ताओं के लिए बैंक जमा बहुत आकर्षक निवेश का विकल्प बन गया है। बैंक 7.5 से आठ फीसद तक का ब्याज इन्हें प्रदान कर रहा है। इस कारण इन जमाकर्ताओं के लिए शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड तुलनात्मक रूप से कम आकर्षक बन रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग की बचत भी उतनी ही तेजी से बढ़ रही है? इसके अलावा, आर्थिक स्थिरता के हिसाब से बहुत महत्त्वपूर्ण और जिस पर बहुत कम चर्चा हो रही है, वह है ऋण-जीडीपी के अनुपात का बढ़ जाना। ये बजट में अनुमानित किए गए 56.1 फीसद से बढ़कर वर्तमान में 57.85 फीसद तक पहुंच गया है। हालांकि ये वृद्धि ऋण के तेजी से बढ़ने की वजह से नहीं, बल्कि आर्थिक आधार के अपेक्षित गति से न बढ़ पाने के कारण है। मगर वर्ष 2030-31 तक ऋण-जीडीपी अनुपात को पचास फीसद तक लाने का सरकार का लक्ष्य अब पहले की तुलना में अधिक कठिन दिखाई देता है। इसलिए यह स्थिति स्पष्ट संकेत देती है कि आने वाले वर्षों में भारत के लिए केवल विकास दर बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि रुपए की स्थिरता और विदेशी पूंजी निवेश के प्रवाह को विस्तार देना अधिक महत्त्वपूर्ण होगा।

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As printed in जनसत्ता.