जनसत्ता
7.8 प्रतिशत की विकास दर: आंकड़ा मजबूत, लेकिन सवाल उससे बड़े
भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026 -27 की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की वास्तविक विकास दर दर्ज की है। पहली नजर में यह आंकड़ा निश्चित रूप से मजबूत दिखाई देता है। सरकार के लिए यह आर्थिक मजबूती का प्रमाण है और यह बताने का अवसर भी कि कठिन वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी गति बनाए हुए है। लेकिन किसी भी विकास दर का वास्तविक मूल्यांकन केवल एक प्रतिशत के आधार पर नहीं किया जा सकता। सवाल यह है कि इस विकास की गुणवत्ता क्या है, इसका लाभ किसे मिल रहा है और आम आदमी के जीवन में इसका कितना असर दिखाई दे रहा है।
मुख्य सवाल यह है कि पिछले वर्ष के आर्थिक आकार में करीब 7 प्रतिशत की कमी क्यों आई और इसका 7.8 प्रतिशत की वर्तमान विकास दर पर कितना असर पड़ा? 2011-12 के पुराने आधार वर्ष में वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही का सकल घरेलू उत्पाद 86.05 लाख करोड़ रुपये था, जो 2022-23 के नए आधार वर्ष में घटकर लगभग 80 लाख करोड़ रुपये रह गया। पुरानी और नई श्रृंखला की सीधी तुलना उचित नहीं है, लेकिन इतने बड़े बदलाव की वजह और वर्तमान विकास दर पर उसके प्रभाव को सरकार को स्पष्ट करना चाहिए।
पहली तिमाही अप्रैल से जून तक केवल तीन महीने की थी। पश्चिम एशिया का संकट फरवरी के अंत से शुरू हो चुका था, लेकिन घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की बड़ी कीमत वृद्धि मई के मध्य और अंतिम सप्ताह में चार चरणों में हुई। यानी तिमाही का लगभग पहला डेढ़ महीना घरेलू ईंधन मूल्य वृद्धि के पूरे प्रभाव से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहा और कीमत वृद्धि का दबाव बाद के हिस्से में आया। क्या यह सरकार की एक रणनीति नहीं थी कि कीमत वृद्धि का असर तिमाही के शुरुआती हिस्से पर कम दिखाई दे और उसका व्यापक प्रभाव बाद की अवधि में सामने आए?
31, अगस्त को जिस दिन 7.8 प्रतिशत की विकास दर सामने आई, उसी दिन सेंसेक्स 307 अंक यानी 0.40 प्रतिशत और निफ्टी 0.39 प्रतिशत नीचे बंद हुए। इसे केवल सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़े की प्रतिक्रिया कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि वैश्विक बाजार, तेल और अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर भी दबाव था। फिर भी मजबूत विकास दर के बावजूद बाजार में व्यापक उत्साह क्यों नहीं दिखाई दिया, यह प्रश्न बना रहता है। इसी के साथ रुपया लगभग 95 रुपये प्रति डॉलर के आसपास है। यदि अर्थव्यवस्था तेजी से मजबूत हो रही है तो हमारी मुद्रा अभी भी तेल की कीमतों, विदेशी पूंजी और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के दबाव में क्यों रहती है? आर्थिक मजबूती केवल उत्पादन बढ़ने का नाम नहीं, अपनी मुद्रा और अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाने की क्षमता भी है।
आम आदमी के लिए 7.8 प्रतिशत की विकास दर का सबसे सीधा परीक्षण उसकी रसोई और रोजमर्रा के खर्च में होता है। सरकारी औसत महंगाई दर 4.45 प्रतिशत हो सकती है, लेकिन परिवार का बजट किसी औसत आंकड़े से नहीं चलता। जुलाई में खाद्य महंगाई 5.52 प्रतिशत रही। अदरक, लहसुन और प्याज जैसी रोजमर्रा की वस्तुओं में तेज वृद्धि दर्ज हुई। सितंबर की शुरुआत में मुंबई क्षेत्र में दूध के थोक भाव 9 रुपये प्रति लीटर बढ़े और सीएनजी तथा परिवहन किराए भी बढ़े। जयपुर में दूध के साथ पनीर जैसे दुग्ध उत्पाद भी महंगे हुए। चीनी की कीमत में हाल में कुछ नरमी आई है, लेकिन उपभोक्ता तक राहत पहुंचने में समय लग रहा है। सीएनजी महंगी होने का असर ऑटो, टैक्सी और माल ढुलाई पर, दूध महंगा होने का असर दही, पनीर और मिठाई पर और ईंधन महंगा होने का असर लगभग हर वस्तु की ढुलाई पर पड़ता है। इसलिए परिवार के लिए महंगाई का अर्थ सूचकांक का प्रतिशत नहीं, महीने के अंत में बची रकम है।
विकास का दूसरा बड़ा प्रश्न रोजगार का है। जुलाई में बेरोजगारी दर 5.1 प्रतिशत रही, जबकि श्रमबल भागीदारी दर 55.4 प्रतिशत थी। केवल रोजगार की संख्या पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है कि क्या विकास युवाओं के लिए पर्याप्त स्थायी और सम्मानजनक रोजगार पैदा कर रहा है। यदि अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, लेकिन संगठित निजी क्षेत्र में रोजगार की गति कमजोर है और छोटे कारोबार लागत तथा मांग के दबाव में हैं, तो विकास की गुणवत्ता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। भारत की बड़ी आबादी आज भी छोटे व्यापार, स्वरोजगार और अनौपचारिक गतिविधियों से जुड़ी है। इसलिए विकास का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से भी होना चाहिए कि इन वर्गों की आय और कारोबार में क्या बदलाव आया।
भारत की प्रति व्यक्ति आय अभी भी लगभग 2700 डॉलर के आसपास है। दूसरी ओर आय के वितरण में असमानता का प्रश्न भी गंभीर है। यदि राष्ट्रीय आय का बड़ा हिस्सा ऊपर के सीमित वर्ग के पास जा रहा है, तो ऊंची विकास दर अपने आप व्यापक आर्थिक समृद्धि का प्रमाण नहीं बन जाती। विकास तभी सार्थक है जब उसकी पहुंच समाज के बड़े हिस्से तक हो और लोगों की क्रय शक्ति बढ़े।
प्रधानमंत्री इस आंकड़े को उपलब्धि के रूप में सामने रखेंगे, विपक्ष इसकी कमियों और विश्वसनीयता पर सवाल उठाएगा, अर्थशास्त्री गणना पद्धति पर बहस करेंगे और सामाजिक माध्यमों पर इसके पक्ष और विपक्ष में लंबी बहस चलेगी। यह सब लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन आम आदमी इन बहसों में बहुत देर तक नहीं उलझता। उसके लिए 7.8 प्रतिशत केवल एक आंकड़ा है। वह देखता है कि उसकी आमदनी बढ़ी या नहीं, रोजगार मिला या नहीं, छोटा कारोबार चला या नहीं, घर का खर्च कितना बढ़ा और महीने के अंत में उसकी बचत कितनी बची। यदि उसकी जिंदगी में बदलाव नहीं आया, तो वह इस आंकड़े को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़कर नहीं देखेगा।
अंततः अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि उसके आंकड़े आम आदमी के जीवन में कितने दिखाई देते हैं। 7.8 प्रतिशत की विकास दर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हो सकती है, लेकिन उसका असली अर्थ तभी है जब यह संख्या देश के आम नागरिक की आय, रोजगार, बचत और क्रय शक्ति में दिखाई दे।