राष्ट्रदूत
क्या शेयर बाजार कभी आम आदमी के निवेश की पहली पसंद बन पाएगा?
भारतीय शेयर बाजार अब तक आम भारतीयों के बीच अपनी विश्वसनीयता को स्थापित नहीं कर पाया है। नवंबर महीने में हुई वित्तीय उठापटक ने इस बात को फिर साबित किया है। आज भारतीय अर्थव्यवस्था विकास की जिस पगडंडी पर खड़ी है, वहां एक आम भारतीय के वित्तीय निवेश को पूंजी बाजार के माध्यम से कंपनियों की तरफ प्रवाह देना अत्यंत आवश्यक है। 90 के दशक के आर्थिक सुधारों के बाद निजीकरण के माध्यम से औद्योगिकीकरण व सर्विस सेक्टर ने अर्थव्यवस्था को आर्थिक विकास के एक नए स्तर पर पहुंचाया है। उसके परिणाम स्वरूप एक आम भारतीय के आर्थिक स्तर में काफी वृद्धि हुई थी।
एक तरफ जहां उसे रोजगार के नये अवसर मिले तथा वित्तीय आय भी लगातार बढ़ती चली गई। वहीं दूसरी तरफ उस की क्रय क्षमता भी लगातार बढ़ी। इस दौरान उसने वित्तीय निवेश की तरफ भी अपना मुख मोड़ा परंतु प्राथमिकता बैंकिंग को ही दी क्योंकि उसे वह सदैव सबसे सुरक्षित लगता है। यानी कि स्टॉक मार्केट वित्तीय निवेश के लिए एक आम भारतीय के लिए पसंद का स्थान नहीं रहा है।
90 के दशक के आर्थिक सुधारों के बाद से भारतीय शेयर बाजार ने ऐतिहासिक सफलताएं अर्जित की है। 30 वर्षों में मुंबई स्टॉक एक्सचेंज का सेंसेक्स 60,000 का दायरा पार कर चुका है। शेयर बाजार की ये जबरदस्त सफलता प्रारंभिक स्तर पर हर किसी को यह विश्वास दिलाती है कि आम भारतीय अपने वित्तीय निवेश के लिए भारतीय शेयर बाजार को दिल से अपना रहा है। वास्तविकता में ये सच्चाई नहीं है। विभिन्न रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक 140 करोड़ की आबादी वाले भारत के मात्र 3 प्रतिशत व्यक्ति ही प्रत्यक्ष रूप से कंपनियों की इक्विटी शेयर कैपिटल में शेयर बाजार के माध्यम से निवेश करते हैं। इससे यह स्पष्ट है कि एक आम भारतीय शेयर बाजार को वित्तीय निवेश के लिए अपनी प्राथमिकता में नहीं रखता है। यह बात अर्थव्यवस्था के दीर्घकालीन आर्थिक विकास के लिए बड़ी घबराहट पैदा करती है क्योंकि अर्थव्यवस्था का विस्तार तभी हो पाएगा जब भारत की कंपनियों को विस्तार करने का मौका मिलेगा। देश के आर्थिक विकास व स्वयं की आर्थिक प्रगति के लिए एक आम भारतीय भी इस बात को समझता है कि कंपनियों के मुनाफे में वृद्धि अत्यंत आवश्यक है। इसके बावजूद वह शेयर बाजार को इसलिए प्राथमिकता नहीं देता है क्योंकि शेयर बाजार की उठापटक उसे सदैव आर्थिक नुकसान के लिए आशंकित करती रहती है।
वर्तमान वर्ष 2021 भारतीय शेयर बाजार के लिए बहुत आकर्षक रहा है। कोरोना के आर्थिक संकटों से उभरने के बाद जिस तरह से तेजी शेयर बाजार ने दिखाई उससे एक तरफ सरकार को भी आर्थिक सहारा मिला वहीं पर वित्तीय निवेशकों व आम आदमी ने भी यह समझा कि आर्थिक रूप से अर्थव्यवस्था सुरक्षित है। बड़ा आश्चर्य हुआ जब कोरोना की दूसरी लहर से निपटने के दौरान ही जुलाई के माह में शेयर बाजार में आईपीओ की झड़ी सी लग गई थी। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2007 के बाद पहली बार वर्ष 2021 में इतने ज्यादा आईपीओ भारतीय पूंजी बाजार में आये। इस दौरान निवेशकों ने भी खूब विश्वास रखा। परिणाम स्वरूप शेयर बाजार निवेशकों को अच्छा मुनाफा भी दे रहा था तथा ऐसा लग रहा था कि इससे एक आम भारतीय के बीच में विश्वसनीयता अब लगातार बढ़ेगी। नवंबर आते-आते यह विश्वसनीयता एकाएक फिर से धोखा दे गयी। एक आम भारतीय निवेशक फिर से शेयर बाजार में धोखा खा गया। यह बात नवंबर के महीने में मुंबई स्टॉक एक्सचेंज के सेंसेक्स की गिरावट व नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के निफ्टी में गिरावट से समझ आती है। एक नवंबर को सेंसेक्स 60138 पॉइंट पर बंद हुआ था वहीं पर यह 30 नवंबर को 57064 पर बंद हुआ अर्थात पूरे माह में सेंसेक्स 3074 पॉइंट गिरा। इसी दौरान 22 नवंबर की 1688 पॉइंट की गिरावट तो निवेशकों में हाहाकार मचा गई थी। इसी तरह एनएसई के निफ्टी में पूरे माह में 946 पॉइंट की गिरावट दर्ज हुई जबकि 22 नवंबर को यह भी 516 पॉइंट नीचे बंद हुआ था।
यह भी कितनी अजीब सी बात है कि जब इन बाजारों में गिरावट का दौर आता है तो विभिन्न नामी-गिरामी विशेषज्ञ उसे भारतीय शेयर बाजार की जरूरत बताते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि कुछ कंपनियों के मूल्य बहुत ऊपर जा चुके थे इसलिए गिरावट स्वभाविक है। क्या इसे वो आम भारतीय समझ सकता है जिसने अपनी अर्थव्यवस्था में विश्वास रखते हुए अपनी छोटी-छोटी बचत को जोड़कर एक अच्छी लाभदायकता के लिए फिर से शेयर बाजार में निवेश किया था? नहीं, वो कभी नहीं समझेगा। विशेषज्ञ तो इस गिरावट में कई आर्थिक, सामाजिक, राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को भी जोड़ देते हैं। परिणाम स्वरूप आम भारतीय अपने साथ हुए इस आर्थिक छलावे को अपना दुर्भाग्य मानता है।
इस पक्ष पर यह समझना भी अत्यंत आवश्यक है कि क्या भारतीय समाज में शेयर बाजार के प्रत्यक्ष निवेशक इसलिए बहुत कम हैं क्योंकि इस बाजार में सिर्फ नुकसान ही होता है। यह पूर्णतया गलत अवधारणा है। वह व्यक्ति जो निवेशक नहीं है उसे शेयर बाजार की ओर विश्वसनीयता के ना चलते इसमें वित्तीय निवेश करने से दूर रखती है।
अब अगर नवंबर माह की ही बात की जाए तो भारत के इन दिनों मशहूर स्टार्टअप पेटीएम जब आईपीओ के माध्यम से शेयर बाजार में आता है तो उसे निवेशकों के द्वारा खूब प्रोत्साहन मिलता है परंतु शेयर बाजार में यह कंपनी निवेशकों के भरोसे को बरकरार नहीं रख पाई तथा 22 नवंबर को हुई भयंकर गिरावट में एक बड़ा कारण भी साबित हुई। 2150 रुपए के प्रारंभिक मूल्य का एक शेयर मुंबई स्टॉक एक्सचेंज पर उन्नीस सौ 50 पर दर्ज हुआ जिसने निवेशकों को प्रति शेयर करीब 9 प्रतिशत का घाटा दिया। उस प्रारंभिक घबराहट के बाद पेटीएम का शेयर लगातार नीचे आता रहा तथा एक शेयर पर 400 का घाटा दे गया। इस दशा में आम आदमी के इस नुकसान का जिम्मेदार किसे ठहराया जाए। जबकि कुछ दिनों पूर्व ही एक और मशहूर स्टार्टअप जमाटो ने पहले दिन ही 52 प्रतिशत का मुनाफा दिया था।
भारतीय शेयर बाजार की विश्वसनीयता के संबंध में पूर्व अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री का वक्तव्य बड़ा खरा सा प्रतीत होता है कि शेयर बाजार के विकास को अर्थव्यवस्था के विकास के साथ नहीं जोड़ कर देखा जा सकता है। यह भी सच्चाई है कि जब शेयर बाजार ऊंचाई के रुख की तरफ होता है तो यह अर्थव्यवस्था में सकारात्मकता को दर्ज कराता है और वैश्विक निवेश के पक्ष पर भी यह एक प्रत्यक्ष आकर्षण का स्रोत होता है। जबकि शेयर बाजार में गिरावट का दौर होता है तो उसे कई दूसरे आयामों से भी जोड़ा जाता है जैसे कि नवंबर के माह में भी यह कहा गया कि कोरोना की पुनः वापसी, विदेशी निवेशकों की बिकवाली, कृषि दिनों की वापसी आदि कई ऐसे कारण थे जिनसे शेयर बाजार में गिरावट दर्ज हुई थी। विश्लेषणात्मक पक्ष को समझने वाला आम व्यक्ति तो यह समझ सकता है कि गिरावट सदैव नहीं रहती है गिरावट के बाद ऊंचाई है तथा ऊंचाई भी सदैव नहीं रहती है ऊंचाई के बाद फिर गिरावट है। लेकिन एक आम निवेशक इन बातों को कभी नहीं समझ पाता है तथा वित्तीय घाटा होने पर उसे भारतीय शेयर बाजार की विश्वसनीयता बहुत अखरती है इस कारण ही वह सदैव सुरक्षित वित्तीय निवेश को प्राथमिकता देने को सोचता है और उस दशा में बैंकिंग उसकी प्राथमिकता में सदैव रहता है।
–डॉ. पी.एस. वोहरा (शिक्षाविद, प्रखर चिंतक व लेखक)