चुनौतियों के बीच उम्मीदों का बजट
देश की विकास दर को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने सात फीसद से ज्यादा माना है। मगर उसके बाद सरकार का ध्यान मुक्त व्यापार समझौतों के माध्यम से निर्यात को बढ़ाने और विदेशी पूंजी निवेश की तरफ चला गया और इस बजट पर उसकी छाया दिखती है।
देश का वर्ष 2026-2027 का आम बजट कुछ सुधारों की दूरगामी सोच की तस्वीर पेश करता है। हालांकि सरकार की पिछली सोच से यह बजट काफी धीमी रफ्तार में दिखा है। कारण साफ है कि अमेरिकी शुल्क का दबाव बना हुआ है। सरकार ने शुरुआती स्तर पर इस दबाव से बचने के लिए जीएसटी दरों में पहले ही कटौती कर दी थी, ताकि घरेलू बाजार में तेजी बनी रहे। इससे तीसरी तिमाही के परिणाम भी आकर्षक रहे। देश की विकास दर को खुद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने सात फीसद से ज्यादा माना है। मगर उसके बाद सरकार का सारा ध्यान मुक्त व्यापार समझौतों के माध्यम से निर्यात को बढ़ाने और विदेशी पूंजी निवेश की तरफ चला गया और यह बजट उसी की छाया में बना दिख रहा है। इसलिए पूंजीगत खर्चों में बढ़ोतरी के संबंध में भी कोई बहुत तेजी वाली घोषणा नहीं हुई, जो बीते कई वर्षों में सरकार की एक बहुत बड़ी ताकत रही है। इसी कारण बजट के तुरंत बाद शेयर बाजार में बड़े स्तर पर गिरावट दर्ज की गई।
बीते कुछ महीनों में विभिन्न देशों और यूरोपीय संघ के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों के तहत सरकार ने सेवा क्षेत्र के अंतर्गत सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र पर भरोसा जताया और वित्तीय सीमा को तीन सौ करोड़ रुपए से बढ़ाकर दो हजार करोड़ रुपए कर दिया गया। इसके माध्यम से आने वाले समय में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के अंतर्गत विभिन्न सुविधाओं में भी सरलीकरण देखने को मिलेगा और उनकी लागत में कमी आएगी। इससे कार्य कुशलता में वृद्धि होगी और वैश्विक स्तर पर भारत की पहचान और तेजी से बढ़ेगी। सोलहवें वित्त आयोग की ओर से अपनी रपट 17 दिसंबर 2025 को संसद में प्रस्तुत की गई थी, मगर उसे शीत सत्र के अंतर्गत सरकार ने संसद के पटल पर नहीं रखा था। ये बड़ा अचंभित करने वाला था, क्योंकि कुछ राज्यों की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं है। इसका कारण मुफ्त की योजनाएं हो सकती हैं।
इस बजट में वित्त आयोग की ओर से 41 फीसद राजस्व का बंटवारा राज्यों को करने के प्रस्ताव को सरकार ने स्वीकार कर लिया है और इसके अंतर्गत तकरीबन एक लाख करोड़ रुपए से अधिक आबंटन राज्यों को किया जाएगा। एक सकारात्मक बात राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण स्थापित करने की है। इस संबंध में वर्ष 2021-22 में आगामी पांच वर्षों के लिए की गई घोषणा के तहत राजकोषीय घाटे को 4.5 फीसद से नीचे लाने के लक्ष्य को पूरा कर लिया गया है। सरकार ने इस पक्ष पर अपनी पीठ भी थपथपाई है और आगामी बजट में राजकोषीय घाटे को 4.3 फीसद पर लाने के उद्देश्य को प्रमुखता के साथ रखा है। बजट में बाहरी ऋण के संबंध में हुई कमी का आंकड़ा भी काफी सकारात्मक नजर आता है।
बजट में निर्माण क्षेत्र के अंतर्गत जेनरिक दवाइयों के उत्पादन में बढ़ोतरी करने की पहल दवा क्षेत्र के लिए बहुत उत्साहजनक है। एमएसएमई पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है, जो बहुत सकारात्मक है। इससे छोटे शहरों का विकास और 'मेक इन इंडिया' में प्रगति भी संभव हो पाएगी। एमएसएमई को पूंजी सहायता के लिए दस हजार करोड़ रुपए की घोषणा की गई है, इसके अतिरिक्त जोखिम से निपटने के लिए दो हजार करोड़ रुपए के अतिरिक्त कोष की भी घोषणा की गई है। छोटे शहरों में एमएसएमई को विभिन्न प्रकार की सहायता के लिए सरकार ने एक अच्छी पहल करते हुए विभिन्न व्यावसायिक संस्थानों को छोटे उद्योगों के साथ एकीकृत करने की योजना बनाई है। इसके तहत बैंकिंग क्षेत्र के लिए ग्रामीण इलाकों में और विस्तार एवं आधुनिकीकरण के वास्ते एक उच्चस्तरीय समिति बनाने की बात रखी गई है। इससे बैंकिंग क्षेत्र विकसि[त] भारत के उद्देश्य की मुख्य धारा में तेजी से आगे बढ़ेगा।
स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकार की ओर से निजी क्षेत्र के साथ आगे बढ़[ते] हुए पांच क्षेत्रीय मेडिकल हब बनाने के उद्देश्य के अंतर्गत विभिन्न प्रका[र] की बीमारियों की जांच, आवश्यक देखभाल और मरीज की पुनर्वा[स] योजना से रोजगार के नए अवसर सृजित होने की काफी संभावना है[।] कैंसर की 17 दवाओं के दाम कम करने को भी एक अच्छी पहल क[े] रूप में देखा जा सकता है। इससे आम लोगों को बड़ी राहत मिलेगी[।] बजट में सेवा क्षेत्र के माध्यम से रोजगार बढ़ाने की पहल भी की ग[ई] है। मगर प्राथमिक स्तर पर अभी सिर्फ एक उच्च स्तरीय समिति बना[ने] की बात की गई है, जिसके माध्यम से ऐसे क्षेत्रों की पहचान करने क[ी] कोशिश की जाएगी, जहां पर संभावनाएं ज्यादा हैं। मगर इसके परिणा[म] भी अभी भविष्य की गर्त में ही है। शोध एवं अनुसंधान के मामले [में] भारत वैश्विक औसत से बहुत पीछे है। इस पर तेजी से आगे बढ़ने क[े] लिए पांच विश्वविद्यालय कारिडोर बनाए जाएंगे, जो निजी क्षेत्र के उद्योग[ों] के साथ मिलकर इस पर कार्य करेंगे। कर से संबंधित घोषणाओं क[े] अंतर्गत कंपनियों में अल्पसंख्यक अंशधारकों के हितों को सुरक्षित रख[ने] के लिए 'बायबैक' योजना के अंतर्गत अब प्रवर्तकों को बाईस फीसद[,] जबकि अन्यों को तीस फीसद कर देना होगा।
वैश्विक स्तर पर कृत्रिम मेधा के क्षेत्र में भारत को तेजी से आगे बढ़[ना] होगा और इसके लिए सरकार ने सभी विदेशी कंपनियों को जो भारत [में] क्लाउड सेवा के अंतर्गत अपनी सेवाएं प्रदान करेंगी, उनके लिए व[र्ष] 2047 तक सौ फीसद कर छूट देने की घोषणा की है। मगर कृत्रिम मेध[ा] से जुड़े वे भारतीय नवउद्यम, जो देश छोड़कर अमेरिका में सेवाएं दे र[हे] हैं, उन्हें वापस आकर्षित करने के प्रयासों पर बजट में चुप्पी अखरती है[।] इसी तरह किसानों की आय को दोगुना करने का दावा करने वाली सरका[र] इस बजट में पूर्ण रूप से शांत दिखी। मात्र कुछ घोषणाएं काजू औ[र] नारियल की खेती के संबंध में की गई है, ताकि इस क्षेत्र में भार[त] आत्मनिर्भर बनकर निर्यात की तरफ तेजी से आगे बढ़े। इसके अलाव[ा] किसानों के ऋण एवं न्यूनतम समर्थन मूल्य आदि पर कोई बात नहीं रख[ी] गई है, जो बहुत निराशाजनक है। बजट में ढांचागत विकास में सात रे[ल] गलियारों के अलावा कोई बड़ी घोषणा नहीं दिखी, जो हतप्रभ करती है[।]
इन सब के बीच एक निराशा यह भी है कि सोने और चांदी के मूल[्य] में लगातार हो रही बढ़ोतरी के मामले में सरकार की ओर से बजट [में] किसी भी प्रकार का शुल्क कम नहीं किया गया है। चांदी के मूल्य [में] हो रही अप्रत्याशित वृद्धि, जिसने असंगठित क्षेत्र के रोजगार पर अस[र] डाला है, उस पर सरकार का मौन रहना समझ से परे है। हालांकि सो[ने] के मूल्य में हो रही बढ़ोतरी पर सरकार की ओर से कहा जाता रहा [है] कि ये सब केंद्रीय बैंक द्वारा की जा रही खरीदारी की वजह से है। य[ह] खरीदारी इसलिए जरूरी है, ताकि भविष्य में डालर के मूल्य में हो र[ही] वृद्धि को नियंत्रित किया जा सके। हालांकि यह पक्ष भी आम जनता क[ी] समझ से बाहर है। इसके अलावा, इस बात से सभी परिचित हैं क[ि] चीन बड़ी तेजी से एआइ, हरित प्रौद्योगिकी और दुर्लभ खनिज पर अपन[ी] बढ़त बना रहा है। इस चुनौती से पार पाने के लिए भी देश के निर्मा[ण] क्षेत्र को कोई बड़ा प्रोत्साहन बजट में नहीं दिखा।