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जनसत्ता

आर्थिक सफरनामा

A review of आर्थिक सफ़रनामा

Sun, 30 April 2023

आर्थिक विकास अर्थशास्त्र का एक पक्ष होता है और इस पर बात मात्र भावनाओं से नहीं की जा सकती। भावनाओं को साबित करने के लिए आंकड़े भी जरूरी हैं। आजादी के तुरंत बाद के वर्षों में हमारे मुल्क में प्रति व्यक्ति आय तकरीबन 265 रुपए थी। उन दिनों हमारी आबादी अड़तीस करोड़ के आसपास थी। आज पचहत्तर वर्ष के बाद आबादी में हम सौ करोड़ बढ़ गए हैं, तो प्रति व्यक्ति आय पांच सौ गुना बढ़कर करीब 128829 रुपए हो गई है। देखने में तो यह एक जबर्दस्त सफल कहानी लगती है। कुछ और आंकड़ों के साथ इसकी गहराई परखी जा सकती है। आजादी के दो दशक के बाद हमारे मुल्क में प्रति व्यक्ति आय मात्र तीन गुना बढ़ी थी। 1970-71 के शुरुआती दिनों में यह 886 रुपए प्रति व्यक्ति थी। साफ है कि भारतीयों के लिए पहले बीस वर्ष आर्थिक रूप से बहुत संघर्षशील थे।

इस पुस्तक को इस तरह से लिखने का प्रयास किया गया है कि पाठक को इसके माध्यम से देश के आर्थिक विकास की जानकारी और उन सभी आयामों का पता चल सके, जिनका प्रभाव आम आदमी के जीवन में प्रत्यक्ष रूप से पड़ता है। मसलन, 1947 के बाद भारत के आर्थिक इतिहास को पुस्तक में कुछ हद तक खंगाला गया है और कुछ घटनाओं की विवेचना आर्थिक पक्ष के माध्यम से भी की गई है, जिनमें अनाज के उत्पादन में आत्मनिर्भर होना है तो क्रिकेट में विश्व में अपनी आर्थिक बादशाहत का होना। इस के अलावा 90 के आर्थिक सुधारों ने कैसे पिछले तीन दशकों में इस मुल्क की आर्थिक दशा और सोच बदल दी, उस पर भी बहुत गहराई से बात करने की कोशिश की गई है। इसके अलावा विभिन्न वैश्विक आर्थिक संकट जिनमें पड़ोसी मुल्कों की आर्थिक बदहाली और कुछ अन्य देशों के आर्थिक संकट, कुछ विकसित मुल्कों पर हमारी निर्भरता का भी विश्लेषण किया गया है।

आर्थिक सफरनामा: डा. पीएस वोहरा; भारती पब्लिकेशंस, 4819/24, दूसरी मंजिल, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 290 रुपए।

The piece as printed
As printed in जनसत्ता. Original e-paper page (may have expired).