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प्रजातंत्र

भारत का बदलता रोजगार भूगोल

कृत्रिम बुद्धिमत्ता में वैश्विक नेतृत्व का सपना जितना आकर्षक दिखाई देता है, उतना ही उसके भीतर रोजगार संकट का एक गंभीर खतरा भी छिपा हुआ है। आने वाले वर्षों में यह केवल तकनीकी परिवर्तन का विषय नहीं रहेगा, बल्कि भारत की आर्थिक और सामाजिक स्थिरता का भी प्रश्न बन सकता है।

इंदौर | शुक्रवार 24 जुलाई, 2026

भारत पिछले तीन दशकों से करोड़ों लोगों को कृषि से निकालकर उद्योग और सेवा क्षेत्र की ओर ले जाने का प्रयास करता रहा है। लेकिन यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) स्वयं इन क्षेत्रों में रोजगार की आवश्यकता कम करने लगे, तो कृषि से निकलने वाली विशाल श्रमशक्ति आखिर कहां जाएगी? यही प्रश्न आज भारत के आर्थिक विकास मॉडल के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता में वैश्विक नेतृत्व का सपना जितना आकर्षक दिखाई देता है, उतना ही उसके भीतर रोजगार संकट का एक गंभीर खतरा भी छिपा हुआ है। आने वाले वर्षों में यह केवल तकनीकी परिवर्तन का विषय नहीं रहेगा, बल्कि भारत की आर्थिक और सामाजिक स्थिरता का भी सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न बन सकता है।

ब्रिक्स देशों की आर्थिक प्रगति का मूल आधार सदैव संरचनात्मक श्रम-स्थानांतरण रहा है। विकास के साथ श्रम कम उत्पादक क्षेत्रों से अधिक उत्पादक क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित होता है।

भारत ने भी यही मार्ग अपनाया। उद्देश्य यह था कि कृषि पर निर्भर अतिरिक्त श्रमशक्ति धीरे-धीरे उद्योग और सेवा क्षेत्र में समाहित हो। बीते तीन दशकों में सूचना प्रौद्योगिकी, बैंकिंग, दूरसंचार, खुदरा व्यापार, पर्यटन और विनिर्माण इसी परिवर्तन के प्रमुख वाहक रहे।

हालांकि, इस दिशा में अभी भी लंबा सफर तय करना बाकी है। पीएलएफएस के अनुसार, भारत के लगभग 46 प्रतिशत कामगार आज भी कृषि एवं उससे जुड़े कार्यों में लगे हुए हैं, जबकि कृषि का योगदान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में केवल लगभग 16 प्रतिशत है। अर्थात् देश की लगभग आधी श्रमशक्ति सबसे कम उत्पादक क्षेत्र में कार्य कर रही है।

यही भारत की अपेक्षाकृत कम प्रति व्यक्ति आय का सबसे बड़ा संरचनात्मक कारण है। पिछले तीन दशकों में सेवा क्षेत्र की तीव्र प्रगति और विनिर्माण क्षेत्र के विस्तार ने भारत को विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं की श्रेणी में पहुंचाया है। फिर भी भारतीय रिजर्व बैंक और विभिन्न आर्थिक सर्वेक्षण लगातार इस बात पर बल देते रहे हैं कि भारत की दीर्घकालिक समृद्धि इस बात पर निर्भर करेगी कि श्रम कम उत्पादक क्षेत्रों से अधिक उत्पादक क्षेत्रों की ओर कितनी सफलतापूर्वक स्थानांतरित होता है।

किन्तु आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने इस पूरे रोजगार मॉडल को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। यदि अधिक उत्पादक क्षेत्र स्वयं कम श्रम-प्रधान होते जाएँगे, तो कृषि से निकलने वाली विशाल श्रमशक्ति को रोजगार कहाँ मिलेगा? यही प्रश्न आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक नीति की सबसे कठिन परीक्षा बनने वाला है। इस परिवर्तन के संकेत अब केवल अनुमान नहीं, बल्कि व्यवहार में भी दिखाई देने लगे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने बैंकिंग क्षेत्र की कार्यप्रणाली को तेजी से बदलना शुरू कर दिया है। हाल ही में प्रकाशित एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 तक एचडीएफसी बैंक में गैर-पर्यवेक्षी कर्मचारियों की संख्या में लगभग 5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। इसी प्रकार भारतीय स्टेट बैंक में भी गैर-पर्यवेक्षी श्रेणी के कर्मचारियों की संख्या में लगभग 7 प्रतिशत की कमी का रुझान सामने आया।

उल्लेखनीय है कि इसी अवधि में प्रबंधकीय तथा उच्च-कौशल वाली भूमिकाओं की आवश्यकता बनी रही। इसका स्पष्ट अर्थ है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता सबसे पहले उन नौकरियों को प्रभावित कर रही है, जो दोहराव वाली और प्रवेश-स्तर की हैं। यही वे नौकरियाँ हैं, जो वर्षों से लाखों भारतीय युवाओं के लिए संगठित क्षेत्र में रोजगार का पहला अवसर रही हैं। उन्नत प्रौद्योगिकी बैंकिंग सेवाओं को अधिक सुरक्षित, तेज और दक्ष अवश्य बनाती है, किंतु एआई-आधारित तकनीक अब केवल कर्मचारियों की सहायता नहीं कर रही, बल्कि अनेक कार्यों में मानवीय श्रम का विकल्प भी बनती जा रही है।

यदि यही प्रवृत्ति बैंकिंग से आगे बढ़कर बीमा, वित्तीय सेवाओं, ग्राहक सहायता, लेखांकन, खुदरा व्यापार, परिवहन, गोदाम प्रबंधन और विनिर्माण तक पहुँचती है, तो भारत का पारंपरिक रोजगार मॉडल गंभीर चुनौती का सामना करेगा। नई नौकरियाँ अवश्य बनेंगी, लेकिन वे अधिक कौशल, विश्लेषण क्षमता और तकनीकी दक्षता की माँग करेंगी। जिन लोगों के पास ये क्षमताएँ नहीं होंगी, उनके लिए अवसर लगातार सीमित होते जाएँगे। भारत में हर वर्ष लगभग 80 लाख से 1 करोड़ युवा श्रम बाजार में प्रवेश करते हैं। ऐसे में यदि निम्न-कौशल आधारित रोजगार तेजी से घटते हैं, तो यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक चुनौती भी बन जाएगी। अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि भारत के लिए वास्तविक चुनौती कृत्रिम बुद्धिमत्ता नहीं, बल्कि उसके कारण बदलता हुआ रोजगार का भूगोल है। यदि कृषि भारत की छिपी हुई बेरोजगारी का प्रतीक है, तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता भविष्य की संभावित बेरोजगारी का संकेत है। अब तक भारत की चुनौती कृषि से लोगों को बाहर निकालने की थी, अब चुनौती यह है कि उन्हें कहाँ ले जाया जाए। यदि सेवा क्षेत्र और विनिर्माण दोनों ही कम श्रम-प्रधान होते गए, तो भारत की पूरी विकास रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ेगा।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी संकेत दिया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता सबसे पहले दोहराव वाले कार्यों को प्रभावित करेगी। विश्व आर्थिक मंच का भी आकलन है कि नई तकनीकें अनेक नए अवसर उत्पन्न करेंगी, किन्तु उनके लिए नए कौशल आवश्यक होंगे। इसलिए भारत की चुनौती केवल नए रोजगार सृजित करना नहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं को बदलती अर्थव्यवस्था के अनुरूप तैयार करना भी है। अब समय आ गया है कि भारत सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि के साथ-साथ रोजगार-सृजन को भी आर्थिक सफलता का प्रमुख मानदंड बनाए। यदि अर्थव्यवस्था सात प्रतिशत की दर से बढ़े, लेकिन रोजगार लगभग स्थिर रहे, तो ऐसी वृद्धि सामाजिक दृष्टि से अधूरी होगी। आर्थिक नीति का मूल्यांकन केवल उत्पादन, निवेश और निर्यात के आधार पर नहीं, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि उससे सम्मानजनक रोजगार कितने उत्पन्न हुए और वे भविष्य में तकनीकी परिवर्तनों के सामने कितने स्थायी सिद्ध होंगे। पाँच, दस या पंद्रह वर्षों बाद भी यदि रोजगार सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो विकास की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विरोध संभव नहीं है, क्योंकि तकनीकी प्रगति आर्थिक विकास की अनिवार्य शर्त है। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि तकनीकी प्रगति का लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँचे। यदि मशीनें अधिक बुद्धिमान होती जाएँ, उत्पादकता बढ़ती जाए, कंपनियों का लाभ बढ़ता जाए और सकल घरेलू उत्पाद भी निरंतर बढ़े, लेकिन करोड़ों युवाओं के सामने सबसे बड़ा प्रश्न फिर भी 'काम कहाँ है?' बना रहे, तो निस्संदेह देश की आर्थिक विकास यात्रा अधूरी मानी जाएगी। कार्यबल पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रभाव बहुआयामी है। इसमें दोहराव वाले और नियमित कार्यों का स्वचालन, कौशल आवश्यकताओं में परिवर्तन और नौकरी विस्थापन शामिल हैं। यह कर्मचारियों के लिए जरूरी बनाता है कि वे अनुकूलित हों क्योंकि इससे उन्हें अधिक जटिल और रचनात्मक कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलता है, लेकिन इससे नौकरी विस्थापन और कुछ प्रकार की नौकरियों की मांग में बदलाव को लेकर चिंताएं भी पैदा हो सकती हैं। हालांकि, कृत्रिम बुद्धिमत्ता नए रोजगार के अवसर भी पैदा कर रही है, विशेष रूप से डेटा विश्लेषण, मशीन लर्निंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकास के क्षेत्र में। इन संभावित लाभों के बावजूद, कार्यबल में बड़े पैमाने पर एआई को लागू करने के नुकसानों को लेकर भी चिंताएँ हैं। एक संभावित चिंता नौकरी छूटने की है, जिससे बेरोजगारी और कौशल विकास की आवश्यकता उत्पन्न हो सकती है। भारत के सामने चुनौती कृत्रिम बुद्धिमत्ता को रोकने की नहीं, बल्कि उसके साथ रोजगार का नया संतुलन स्थापित करने की है। यदि यह संतुलन बना लिया गया, तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारत की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति सिद्ध हो सकती है, लेकिन यदि करोड़ों युवाओं के लिए सम्मानजनक और स्थायी रोजगार सुनिश्चित नहीं किए जा सके, तो यही तकनीकी सामाजिक असमानता को नई ऊँचाई भी खींच सकती है। इसकी शुरुआत के संकेत अब स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं। विकसित भारत 2047 की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि मशीनों की बढ़ती बुद्धिमत्ता के साथ मनुष्यों के लिए अवसर भी समान गति से बढ़ते रहें। तभी तकनीकी प्रगति वास्तव में समावेशी विकास का आधार बन सकेगी।

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