Economy
जिस पोस्को को ओडिशा में जमीन नहीं मिली, वह फिर क्यों लौटा?

करीब 20 साल पहले 12 अरब डॉलर के निवेश का सपना लेकर ओडिशा आई दक्षिण कोरियाई इस्पात कंपनी पोस्को को जमीन के सवाल पर लौटना पड़ा था। 2017 में उसने जमीन सरकार को वापस कर दी और परियोजना समाप्त हो गई। अब वही पोस्को भारतीय इस्पात समूह जेएसडब्ल्यू के साथ करीब रुपये 35,000 करोड़ की नई परियोजना लेकर ओडिशा लौटा है। इस बार मंजिल है क्योंझर, जो वर्तमान मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी का गृह जिला भी है। करीब दो दशक पहले का भारत आज के भारत से काफी अलग था। 2004 में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में नई सरकार बनी थी और देश बड़े विदेशी निवेश को आकर्षित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा था। भारत और दक्षिण कोरिया के आर्थिक संबंध भी मजबूत हो रहे थे। इसी दौर में पोस्को ने ओडिशा में अपनी बड़ी औद्योगिक उपस्थिति बनाने की योजना सामने रखी।
2005 में ओडिशा सरकार और पोस्को के बीच समझौता हुआ। जगतसिंहपुर जिले में करीब 1.2 करोड़ टन सालाना क्षमता वाला विशाल एकीकृत इस्पात संयंत्र स्थापित करने की योजना बनी। प्रस्तावित निवेश करीब रुपये 52,000 करोड़ था, जो उस समय की विनिमय दर के आधार पर लगभग 12 अरब डॉलर के बराबर था। इसे भारत में उस समय के सबसे बड़े प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रस्तावों में गिना गया।
यह केवल एक इस्पात संयंत्र नहीं था। इसके साथ रोजगार, बंदरगाह, खनिज, परिवहन और पूरे क्षेत्र के औद्योगिक विकास की उम्मीदें जुड़ी थीं। लेकिन इतने बड़े सपने की सबसे बड़ी बाधा पूंजी या तकनीक नहीं, जमीन बन गई।
करीब 4,000 एकड़ जमीन और पान की खेती
परियोजना के लिए लगभग 4,000 एकड़ जमीन चाहिए थी। इसमें करीब 3,566 एकड़ सरकारी और 438 एकड़ निजी जमीन थी। आंकड़ों से लगता था कि जमीन की व्यवस्था कठिन नहीं होनी चाहिए, लेकिन जमीन का सरकारी स्वामित्व स्थानीय लोगों की सहमति की गारंटी नहीं था।
जगतसिंहपुर का यह इलाका पान की खेती के लिए प्रसिद्ध था। अनेक परिवारों की आजीविका जमीन और पान की बाड़ियों से जुड़ी थी। ऐसे में भूमि अधिग्रहण उनके लिए केवल मुआवजे का प्रश्न नहीं था, बल्कि रोजी रोटी और भविष्य का प्रश्न था।
सरकार के लिए वही जमीन औद्योगिक विकास का आधार थी, पोस्को के लिए विशाल इस्पात संयंत्र की नींव और ग्रामीणों के लिए जीवन का सहारा।
यही टकराव धीरे धीरे परियोजना की सबसे बड़ी समस्या बन गया। भूमि अधिग्रहण के विरोध के साथ पर्यावरण और प्रशासनिक मंजूरियों से जुड़े प्रश्न भी सामने आए। वर्षों तक परियोजना को आगे बढ़ाने की कोशिश होती रही, लेकिन स्थानीय स्तर पर वह स्वीकार्यता नहीं बन सकी जिसकी इतनी बड़ी परियोजना को जरूरत थी।
26 जनवरी 2010: रिश्ते मजबूत, लेकिन जमीन पर गतिरोध
26 जनवरी 2010 को दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली म्युंग बाक भारत के गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि थे। उस समय पोस्को परियोजना भारत और दक्षिण कोरिया के आर्थिक संबंधों की महत्वपूर्ण मिसाल बन चुकी थी।
उम्मीद थी कि दोनों देशों के मजबूत होते संबंधों के बीच परियोजना को भी गति मिलेगी। लेकिन दिल्ली की कूटनीतिक गर्माहट और जगतसिंहपुर की जमीन पर मौजूद विरोध के बीच दूरी बनी रही। प्रस्तावित परियोजना स्थल की राष्ट्रपति यात्रा भी नहीं हो सकी।
यह इस कहानी का बड़ा विरोधाभास था। दो देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच आर्थिक संबंध मजबूत हो रहे थे, लेकिन उन्हीं संबंधों की सबसे बड़ी औद्योगिक परियोजना स्थानीय जमीन पर सहमति के लिए संघर्ष कर रही थी।
2014 के बाद बदला नियम, 2017 में खत्म हुआ सपना
जब पोस्को की परियोजना जमीन के विवाद में फंसी थी, तब भारत की खनन व्यवस्था भी बदल गई। 2014 के बाद खनिज संसाधनों के आवंटन और नीलामी से जुड़े नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव हुए।
दूसरी ओर पोस्को की परियोजना वर्षों की देरी का सामना कर चुकी थी। लागत, खनिज व्यवस्था और कारोबारी परिस्थितियां बदल रही थीं। जिस परियोजना को कभी भारत में विदेशी निवेश की सबसे बड़ी उपलब्धियों में देखा गया था, उसका आर्थिक आधार धीरे धीरे कमजोर पड़ रहा था।
मार्च 2017 में पोस्को ने परियोजना के लिए मिली जमीन वापस करने का निर्णय लिया। अप्रैल 2017 में ओडिशा सरकार ने परियोजना को समाप्त कर दिया।
करीब रुपये 52,000 करोड़ और लगभग 12 अरब डॉलर का निवेश वाला सपना बिना इस्पात का उत्पादन शुरू किए खत्म हो गया।
लेकिन भारत की कहानी वहीं नहीं रुकी और शायद पोस्को की भी नहीं।
क्योंझर में नई शुरुआत – इस बार साथ सज्जन जिंदल के नेतृत्व वाला जेएसडब्ल्यू समूह है
करीब 20 साल बाद पोस्को फिर ओडिशा में है। इस बार उसके साथ सज्जन जिंदल के नेतृत्व वाला जेएसडब्ल्यू समूह है। दोनों कंपनियों ने 50:50 साझेदारी में करीब रुपये 35,000 करोड़ के निवेश से लगभग 60 लाख टन सालाना क्षमता वाले एकीकृत इस्पात संयंत्र की योजना बनाई है।
और इस बार जगह है क्योंझर।
क्योंझर ओडिशा का प्रमुख खनिज क्षेत्र है और वर्तमान मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी का गृह जिला भी। इसलिए नई परियोजना का स्थान अपने आप में महत्वपूर्ण है। जिस राज्य में पोस्को की पहली बड़ी परियोजना जमीन के विवाद में फंसी थी, उसी राज्य के खनिज क्षेत्र में कंपनी अब एक भारतीय औद्योगिक समूह के साथ नई शुरुआत कर रही है।
यही इस बार का सबसे बड़ा अंतर है।
पहली बार पोस्को एक विदेशी कंपनी के रूप में विशाल परियोजना लेकर आई थी। दूसरी बार वह भारत के एक स्थापित औद्योगिक समूह के साथ आई है। पोस्को की वैश्विक तकनीकी क्षमता और जेएसडब्ल्यू का भारतीय औद्योगिक अनुभव एक साथ आ रहे हैं।
यह केवल साझेदारी नहीं, पिछले अनुभव से निकली रणनीति भी हो सकती है।