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शिक्षा में थिएटर : एक परिवर्तनकारी शैक्षिक पहल
Students & staff
विद्यार्थियों की अंतर्निहित प्रतिभा, व्यक्तित्व विकास और शिक्षकों के निरंतर सीखने की दिशा में एक अभिनव प्रयास
वर्ष 2016 से एसटीबीए के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं प्रधानाचार्य के रूप में कार्य करते हुए मेरे मन में शुरू से ही यह विचार रहा है कि विद्यालय में शिक्षा और शिक्षण की पद्धति को समय के साथ बदलते रहना चाहिए। केवल वही पढ़ाना जो वर्षों से पढ़ाया जाता रहा है, मेरे लिए पर्याप्त नहीं रहा। मेरा हमेशा प्रयास रहा है कि विद्यार्थियों को सीखने के ऐसे अवसर मिलें, जिनसे वे अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अपने भीतर छिपी प्रतिभा और क्षमताओं को भी पहचान सकें।
इसी सोच के कारण मैंने विद्यालय में विभिन्न नए प्रयोगों पर काम किया। इनमें से थिएटर मेरे लिए एक विशेष पहल रही है।
मेरा मानना था कि थिएटर को केवल मनोरंजन या मंचीय कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके माध्यम से विद्यार्थी बहुत कुछ सीख सकते हैं—अपनी बात रखना, दूसरों को सुनना, आत्मविश्वास के साथ सामने आना, समूह में काम करना, परिस्थितियों को समझना और सबसे महत्वपूर्ण, स्वयं को पहचानना।
थिएटर के माध्यम से विद्यार्थियों की उन प्रतिभाओं तक भी पहुँचा जा सकता है, जो सामान्य कक्षा और परीक्षा में हमेशा दिखाई नहीं देतीं।
विद्यार्थियों के साथ-साथ शिक्षकों पर भी ध्यान
जब मैंने विद्यार्थियों के लिए थिएटर को शिक्षा का हिस्सा बनाने के बारे में सोचा, उसी समय मेरे मन में एक दूसरा विचार भी था—यदि शिक्षक स्वयं थिएटर सीखें और उसमें भाग लें, तो इसका प्रभाव उनके शिक्षण पर भी पड़ेगा।
एक शिक्षक जितना अधिक सीखता है, स्वयं को नई परिस्थितियों में आजमाता है और अलग-अलग तरीकों से अभिव्यक्त करना सीखता है, उतना ही वह अपनी कक्षा में विद्यार्थियों से बेहतर जुड़ सकता है।
इसी कारण मैंने थिएटर को केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रखा। मेरी इच्छा थी कि हमारे शिक्षक भी इसमें सक्रिय रूप से भाग लें, सीखें और स्वयं को एक नए क्षेत्र में आजमाएँ।
2019 में हुई शुरुआत
इस विचार को व्यवस्थित रूप देने की दिशा में वर्ष 2019 महत्वपूर्ण रहा। मैंने स्वयं विद्यालय के लिए थिएटर का पाठ्यक्रम तैयार किया और उसे विद्यालय में लागू किया। कक्षा 6 से 8 तक के विद्यार्थियों के लिए थिएटर के माध्यम से मूल्यांकन की प्रक्रिया भी शुरू की गई।
इसके बाद धीरे-धीरे विद्यालय में अपनी नाट्य प्रस्तुतियाँ तैयार होने लगीं। हमने पूर्णकालिक थिएटर शिक्षकों की व्यवस्था की और विद्यालय के भीतर नियमित रूप से नाटक तैयार करने और प्रस्तुत करने की परंपरा विकसित हुई।
आज यह देखकर संतोष होता है कि हमारी लगभग 15 नाट्य प्रस्तुतियाँ विद्यालय की अब तक की यात्रा का हिस्सा बन चुकी हैं।
मेरे लिए इन प्रस्तुतियों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि थिएटर अब विद्यालय में एक नियमित गतिविधि नहीं, बल्कि सीखने की एक स्वीकृत प्रक्रिया बन चुका है।
एक दिन, तीन नाटक और एक बड़ा अनुभव
पिछले वर्ष विद्यालय में बाफना विद्यालय थिएटर महोत्सव का आयोजन किया गया। एक ही दिन में तीन नाटकों का मंचन हुआ। यह हमारे लिए एक अलग तरह का अनुभव था, क्योंकि इसमें विद्यालय के भीतर चल रही थिएटर की पूरी यात्रा को एक बड़े मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर मिला।
इस आयोजन में प्रसिद्ध अभिनेता श्री राकेश बेदी जी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
इसी अवसर पर छह प्रसिद्ध थिएटर लेखकों, अभिनेताओं और संवाद विशेषज्ञों के साथ एक विशेष परिचर्चा भी आयोजित की गई। इस परिचर्चा का संचालन करने का अवसर मुझे मिला। अलग-अलग क्षेत्रों में लंबे समय से काम कर रहे इन अनुभवी लोगों के विचारों को सुनना और उनके साथ संवाद करना अपने आप में मेरे लिए भी एक सीखने वाला अनुभव था।
अब प्रत्येक माह का पहला शनिवार थिएटर के नाम
आज हमारे विद्यालय में प्रत्येक माह का पहला शनिवार थिएटर के लिए निर्धारित है। इस दिन हमारे शिक्षक स्वयं नाट्य प्रस्तुतियाँ करते हैं और विद्यार्थी बैठकर उन्हें देखते हैं।
मुझे इस व्यवस्था में सबसे अच्छी बात यह लगती है कि विद्यार्थी अपने शिक्षकों को एक अलग भूमिका में देखते हैं। वे देखते हैं कि उनके शिक्षक भी सीख रहे हैं, तैयारी कर रहे हैं, अभ्यास कर रहे हैं और मंच पर अपनी प्रस्तुति दे रहे हैं।
दूसरी ओर, हमारे शिक्षक भी हर प्रस्तुति के साथ कुछ नया सीख रहे हैं।
मेरे विचार से यही किसी भी शैक्षिक प्रयोग की सफलता है—जब वह केवल विद्यार्थियों तक न रहकर पूरे विद्यालय को सीखने की प्रक्रिया में शामिल कर ले।
थिएटर अब विद्यालय की सीमा तक सीमित नहीं
इस पहल का एक सुखद परिणाम यह भी रहा है कि हमारे शिक्षकों ने विद्यालय के बाहर भी थिएटर के मंचों पर अपनी पहचान बनानी शुरू की है। हमारे शिक्षक अलवर रंगम के 100 दिवसीय कार्यक्रम सहित अन्य बाहरी मंचों पर भी प्रस्तुतियों का हिस्सा बने हैं।
यह देखकर मुझे विशेष खुशी होती है कि जिस पहल की शुरुआत विद्यालय में शिक्षकों और विद्यार्थियों के विकास के उद्देश्य से हुई थी, उसने हमारे शिक्षकों को अपनी रुचि और प्रतिभा को विद्यालय के बाहर भी आगे बढ़ाने का अवसर दिया।
मेरे लिए थिएटर का अर्थ
मैं थिएटर को केवल अभिनय के रूप में नहीं देखता। मेरे लिए यह सीखने का एक अलग तरीका है।
कक्षा में हम विद्यार्थियों को बहुत कुछ बताते हैं, लेकिन थिएटर उन्हें बहुत कुछ करके सीखने का अवसर देता है। वे बोलते हैं, सुनते हैं, सोचते हैं, महसूस करते हैं, गलती करते हैं, दोबारा प्रयास करते हैं और अंततः अपनी प्रस्तुति के माध्यम से स्वयं को व्यक्त करते हैं।
यही अनुभव उनके व्यक्तित्व में धीरे-धीरे दिखाई देने लगता है।
वर्ष 2016 से मेरा प्रयास यही रहा है कि एसटीबीए में शिक्षा केवल पुस्तकों और परीक्षाओं तक सीमित न रहे। विद्यार्थी और शिक्षक दोनों ऐसी चीजें सीखें, जो उन्हें कक्षा के बाहर भी जीवन में आगे बढ़ने में मदद करें।
थिएटर इसी सोच का एक हिस्सा है—एक ऐसा प्रयास, जो विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा पहचानने का अवसर देता है और शिक्षकों को स्वयं एक विद्यार्थी बने रहने की याद दिलाता है।
मेरे लिए यह यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। सीखने की प्रक्रिया चलती रहनी चाहिए, प्रयोग होते रहने चाहिए और शिक्षा को हर दिन थोड़ा परिवर्तित रूप में आगे बढ़ाना चाहिए।
