राजस्थान पत्रिका
शोध के क्षेत्र पर भी ध्यान दे रहे हैं भारतीय उद्योग
अर्थ-जगत : शोध कार्यों में पूंजी निवेश लगातार बढ़ रहा है
भारत अपनी आर्थिक विकास की रफ्तार के आधार पर आज मजबूत वैश्विक साख बनाए हुए है। विश्व की पांच बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होना इस बात का सबूत भी है, लेकिन यह भी सच है कि भारत को अक्सर यह उलाहना भी दिया जाता है कि उसका शोध व अनुसंधान में आर्थिक निवेश बहुत कम है। इस आरोप का आधार यह है कि शोध व विकास में आर्थिक निवेश का वैश्विक औसत 1.8 प्रतिशत है, जबकि भारत में यह जीडीपी का मात्र 0.7 प्रतिशत ही है। वैश्विक स्तर पर कंपनियां अपने मुनाफे का तकरीबन दो तिहाई हिस्सा वार्षिक स्तर पर अनुसंधान और विकास में निवेश करती हैं, जबकि भारतीय कंपनियों में यह मात्र एक तिहाई हिस्से से कुछ ज्यादा है। विभिन्न वैश्विक पटल पर चल रही यह चर्चा पिछले कुछ अरसे से इस बात का नैरेटिव सेट कर रही है कि अमरीका, जापान, दक्षिण कोरिया तथा चीन ही वैश्विक बागडोर को संभालने में सक्षम हैं, क्योंकि इनके यहां पूंजी का अधिकतम निवेश शोध व अनुसंधान में किया जाता है, जो कि भविष्य के आर्थिक विकास की एक वास्तविक आधारशिला है। यह चर्चा इस पक्ष को भी जन्म दे रही है कि बड़े विकसित मुल्कों की कंपनियां ही नए से नए नवाचारों को अधिक महत्त्व देती हैं और भारतीय कंपनियां इस मामले में बहुत पीछे हैं। कहीं न कहीं यह तथ्य अंत में जाकर भारतीय कंपनियों की जोखिम उठाने की क्षमता पर भी एक प्रश्न खड़ा कर देता है।
क्या वास्तव में भारतीय कंपनियां नवाचारों को अधिक महत्त्व नहीं देती हैं? इस पक्ष पर विश्लेषण यह साबित करता है कि यह सोच पूर्णतया निराधार है। भारत लगातार श्रमिकों की कार्यकुशलता को बढ़ाने के लिए शोध और विकास में अधिक निवेश कर रहा है। इन दिनों स्टार्टअप के दौर में जब ऑर्डर दिए जाने के दस मिनट के अंदर ग्राहक के पास उसकी पसंद की वस्तु कंपनी के द्वारा पहुंचा दी जाती है, तो यह इस बात को साबित करता है कि विभिन्न कंपनियां बहुत बेहतरीन आर्थिक निवेश शोध और विकास के माध्यम से अपने श्रमिकों में कर रही हैं। बड़े शहरों में मोबाइल एप्लीकेशन के माध्यम से पांच से दस मिनट के अंदर ग्राहक के पास पहुंचने वाली टैक्सी उसे उसके गंतव्य स्थल पर ले जाने के लिए उपलब्ध हो जाती है, जो उसे पब्लिक ट्रांसपोर्ट के धक्कों से भी बचा रही है और अनजाने रास्तों की पहचान के जोखिम को भी खत्म कर रही है। यह निश्चित रूप से सर्विस सेक्टर की कंपनियों के द्वारा किया जाने वाला एक लाजवाब इनोवेशन ही तो है। क्या एक भीड़भाड़ वाले इलाके में डिलीवरी देने वाले श्रमिक को या कार चलाने वाले ड्राइवर को तकनीक के माध्यम से एक ऐसा रास्ता बताना जहां पर आवाजाही कम है तथा जो न्यूनतम समय सीमा पर ग्राहक तक पहुंचाए नवाचार नहीं है। इस तरह के कई नवाचार सभी क्षेत्रों में चल रहे हैं। इससे साफ है कि भारतीय कंपनियां शोध के महत्त्व को समझती हैं।
विकसित देशों की बड़ी कंपनियों ने एक ऐसी प्रतिस्पर्धा को जन्म दे दिया है, जिसने ग्राहक की आवश्यकता को तुरंत मांग बनाने का फैशन बना दिया है। देखा जाता है कि किसी भी प्रॉडक्ट का प्रारंभिक विक्रय बहुत अधिक रखा जाता है। एक या दो वर्ष बाद उसे आधे मूल्य पर बेचा जाता है। इसके पीछे का मुख्य आधार यह है कि बड़ी कंपनियां इस तथ्य से अच्छी तरह परिचित हैं कि उन्हें शुरू में अपने प्रॉडक्ट को समाज के धनाढ्य लोगों को ही बेचना है और उनके माध्यम से अपने उत्पाद को एक ब्रांड के रूप में स्थापित भी करना है। इस तरह धनाढ्य लोगों से वसूल किया गया विक्रय मूल्य उत्पादन की लागत से बहुत ज्यादा होता है और उसी मुनाफे को शोध व विकास में निवेश किया जाता है।
जहां तक भारत की बात है, तो ऑटो तथा फार्मा सेक्टर पिछले कुछ अर्से से लगातार शोध व विकास में पूंजी के निवेश को लगातार बढ़ा रहे हैं। इसी कारण वैश्विक स्तर पर इनकी गुणवत्ता और साख लगातार बढ़ रही है। कोरोना महामारी के समय भारत ने अपनी खुद की वैक्सीन का निर्माण किया था तथा 140 करोड़ लोगों को महामारी के दुष्प्रभावों से बचाने में एक महती भूमिका निभाई थी। भारत की इस पक्ष पर एक संतुलित सोच। यानी श्रमिकों को नई तकनीक से जोड़ने पर निवेश किया जाए और आगे बढ़ा जाए, ताकि प्रति व्यक्ति कार्यकुशलता बढ़ सके। इसी के माध्यम से भारतीय उद्योग अपने आपको मजबूत बनाने में सक्षम होंगे।