बजट से आम आदमी जरूर खुश हो सकता है, पर यह दूरगामी नहीं
वर्ष 2025-26 का मोदी सरकार का बजट अब जनता के सामने है। वित्त मंत्री ने आयकर से मुक्त न्यूनतम वित्तीय आय को 7 लाख से बढ़ाकर 12 लाख तक कर दिया है। ऐसे में प्रारंभिक स्तर पर ही आम आदमी के बजट का तमगा दे दिया गया है। जबकि आर्थिक विश्लेषण में इससे कोई गहन सरोकार नहीं दिख रहे है।
एक दिन पहले प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण में आर्थिक विकास की दर में कमी को प्रस्तावित किया गया, तब स्पष्ट हो गया कि सरकार के सामने कुछ कुछ करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। ये बजट प्रधानमंत्री मोदी की विकसित भारत की संकल्प शक्ति के साथ तालमेल नहीं खा रहा है। मोदी सरकार ने अपने दो कार्यकाल में पूंजीगत खर्च को 2 लाख करोड़ से बढ़ाकर 11 लाख करोड़ तक रखा, लेकिन इस बार पूर्णविराम देखने को मिला। जो ताज्जुब भरा है। परन्तु आयकर की दरों में बदलाव व न्यूनतम आयकर सीमा में बढ़ोतरी ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकार के पास पूंजीगत खर्चों में बढ़ोतरी के लिए और अधिक वित्तीय नियोजन की जगह इस बजट में नहीं थी। इससे निजी निवेश हतोत्साहित होने का खतरा है। तस्वीर का दूसरा पक्ष यह भी है कि आयकर की सीमा में बदलाव से आम आदमी के हाथ में पैसा अधिक रहेगा। उसकी क्रय क्षमता और बढ़ेगी। अंततः प्रत्यक्ष फायदा व्यापारियों व कंपनियों को ही होगा। इससे बजट ने वैश्विक अंदेशे पर भी पूर्ण विराम लगा दिया है कि भारत मंदी की तरफ अग्रसर है।
राष्ट्रपति ट्रंप के वापस सत्ता में आने और कुछ दिनों से रुपए के मुकाबले डॉलर के मजबूत होने का असर भी बजट में दिखता है। यदि ट्रंप और चीन के बीच तनातनी बढ़ती है तो इसका भारत पर आर्थिक असर पड़ने से रोकने के प्रयास पहले ही कर दिए गए हैं। इसके लिए मोदी सरकार की सराहना होनी चाहिए। बजट में सराहनीय है, स्टार्ट अप्स के लिए 10,000 करोड़ के एक नए फंड की स्थापना करना। खिलौने के उत्पादन में वैश्विक स्तर पर अग्रणी बनने की नीति। एलसीडी, एलईडी पर कस्टम ड्यूटी की कमी चीन से आने वाले इन उत्पादों की खपत भारत में बढ़ेगी क्या, यह प्रश्न भी विचारणीय है। पिछले साल जुलाई के बजट में अप्रेंटिसशिप के माध्यम से नौकरियों की बात की गई लेकिन, इस बार इस पर कोई चर्चा नहीं की। निष्कर्ष में यह कहा जा सकता है कि बजट से भारत के करीब 30 करोड़ मध्यम वर्ग को आर्थिक संपन्नता देने की कोशिश की हैं। परंतु विकसित भारत की ओर बढ़ने के लिए जरूरी आर्थिक सुधारों का अभाव रहा है।