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राजस्थान पत्रिका

रोजगार बढ़ाने की चुनौती, नीतियों में बदलाव जरूरी

बेरोजगारी के कारण आर्थिक विषमता भी बढ़ी

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किसी भी देश के आर्थिक विकास के मार्ग में बेरोजगारी सबसे बड़ी चुनौती होती है। बेरोजगारी को किसी एक कारण से जोड़ना गलत है। ठीक इसी तरह इसका कोई एक हल भी नहीं हो सकता है। आज भी आधी से अधिक आबादी रोजगार के लिए कृषि क्षेत्र पर निर्भर है तथा बाकी बची औद्योगिक व सर्विस क्षेत्रों पर निर्भर है। सर्विस क्षेत्र का योगदान औद्योगिक क्षेत्र से आंशिक रूप से अधिक है। आंकड़ों के अनुसार 33 प्रतिशत लोग रोजगार के लिए सर्विस क्षेत्र पर निर्भर हैं, जबकि करीब 25 प्रतिशत औद्योगिक क्षेत्र पर। विडंबना यह भी है कि कृषि क्षेत्र का योगदान जीडीपी में मात्र 15 प्रतिशत के आसपास ही है। इसीलिए पिछले तीन-चार दशकों से ग्रामीण जनसंख्या का प्रतिशत बेरोजगारी की दर में अधिक है। पिछले वर्षों में करीब 4 करोड़ ग्रामीण लोगों ने कृषि क्षेत्र को छोड़ा है। ये लोग शहरों में विभिन्न तरह के असंगठित क्षेत्रों से जुड़कर अपना जीवन चला रहे हैं।

लगातार चली आ रही बेरोजगारी की समस्या का एक दुष्प्रभाव यह भी सामने आया है कि इससे समाज में आर्थिक विषमता बहुत बढ़ गई है। 90 के दशक के आर्थिक सुधारों के बाद से भारत में अर्थव्यवस्था की बागडोर निजी क्षेत्रों के हाथ में है। दूसरी तरफ जब हर सरकार बेरोजगारी की समस्या का कोई हल नहीं निकाल पाई है, तो उसका यह दुष्परिणाम हुआ है कि आज विश्व में भारत दूसरा सबसे बड़ा आर्थिक विषमता वाला मुल्क बन गया है। अगर बेरोजगारी की समस्या लगातार बढ़ती रही, तो यह खाई और गहरी होती रहेगी। इस समस्या के हल के लिए अब जरूरत है कि आर्थिक नीतियों में औद्योगिक क्षेत्र के विस्तार की ज्यादा से ज्यादा वकालत की जाए। अब इस संदर्भ में भारत में औद्योगिक क्षेत्र के संघर्ष के विश्लेषणात्मक अध्ययन की आवश्यकता है। निश्चित तौर पर वैश्विक स्तर पर अधिक लागत और कम गुणवत्ता भारत के औद्योगिक क्षेत्र के लिए मुख्य चुनौतियां हैं। इनको दूर करने के लिए औद्योगिक क्षेत्र में शोध व अनुसंधान पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित करके शुरुआत की जानी चाहिए। आंकड़ों के अनुसार आज भारत में जीडीपी का मात्र 0.7 प्रतिशत ही शोध व अनुसंधान पर खर्च होता है, जबकि यह खर्च इजरायल में 4.6 प्रतिशत, जापान में 3.2 प्रतिशत, जर्मनी में 3 व अमरीका में 2.8 प्रतिशत है। अगर यह बढ़ेगा, तो भारत के औद्योगिक क्षेत्रों की वैश्विक साख बढ़ेगी। अंततः इसके माध्यम से औद्योगिक क्षेत्रों की इकाइयों का छोटे शहरों में विस्तारीकरण होगा, जिससे कृषि क्षेत्र पर निर्भर जनसंख्या को रोजगार का एक नया अवसर उपलब्ध होगा। कृषि क्षेत्र के वैज्ञानिकीकरण की भी अत्यंत आवश्यकता है। बेरोजगारी के अलावा अर्थव्यवस्था के समग्र विकास के लिए भी कृषि क्षेत्र का सुदृढ़ होना अत्यंत आवश्यक है। इससे ग्रामीण जनसंख्या का पलायन भी रोका जा सकता है। कोशिश की जानी चाहिए कि कृषि की लागत कम हो। इसके लिए सरकार अपने कर ढांचे में परिवर्तन करे तथा कृषि से संबंधित चीजों पर कर की दरों को कम रखे।

सरकार नए सर्विस क्षेत्र चिह्नित करे। मनोरंजन के क्षेत्र, वित्तीय सुविधाओं के क्षेत्र और शिक्षा के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं। सूचना तकनीक के साथ ये सभी क्षेत्र रोजगार सृजन में अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं। इसके अलावा जिन क्षेत्रों में विस्तार की संभावनाएं हैं, उन्हें तुरंत बढ़ाया जाए। कोरोना के संकट ने भी यह समझाया है कि भारत में चिकित्सा सुविधाओं का क्षेत्र बहुत कमजोर है। इसलिए अब हेल्थ केयर इंडस्ट्री को विस्तार देना अत्यंत आवश्यक है। इसी से संबंधित फार्मास्यूटिकल क्षेत्र में भी वैश्विक स्तर पर काफी संभावनाएं हैं। इन सबके अलावा शिक्षा का आधुनिकीकरण बेरोजगारी की समस्या के हल के लिए एक मजबूत विकल्प के तौर पर उपयोग में लाया जा सकता है।

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As printed in राजस्थान पत्रिका.