अमर उजाला
जीडीपी के साथ प्रति व्यक्ति आय भी
जीडीपी का आकार बढ़ाने के साथ-साथ प्रति व्यक्ति आय को भी एक आदर्श मुकाम पर ले जाना आर्थिक नीतियों का मुख्य मकसद होना चाहिए।
देश की अर्थव्यवस्था को विश्व में तीसरे नंबर पर ले जाने की सरकार की प्रतिबद्धता प्रधानमंत्री के हाल ही के कई बयानों में साफ दिखाई पड़ी। अपनी हाल की अमेरिका यात्रा के दौरान वहां कांग्रेस के संयुक्त अधिवेशन में भी उन्होंने वर्ष 2028 से पहले भारत की तीसरी बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने की बात कही। बीते दिनों 'भारत मंडपम' के उद्घाटन के अवसर पर भी उन्होंने इस बात की गारंटी दी कि उनकी सरकार के आगामी कार्यकाल में वह भारत को तीसरी बड़ी आर्थिक महाशक्ति बना देंगे। इस पक्ष पर एक अन्य सकारात्मक बात यह है कि अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपनी जुलाई, 2023 की रिपोर्ट के अंतर्गत वर्ष 2023-24 के लिए भारत की वार्षिक विकास दर को 6.1 प्रतिशत अनुमानित किया है, जबकि आईएमएफ की पिछली रिपोर्ट में यह अनुमान छह प्रतिशत से कम का था। आईएमएफ की हाल ही की इस रिपोर्ट में वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर तीन प्रतिशत आंकी गई है, जबकि अप्रैल की पिछली रिपोर्ट में यह 2.8 प्रतिशत आंकी गई थी।
आर्थिक विकास दर में यह सुधार निश्चित रूप से अमेरिका द्वारा अपने केंद्रीय बैंक को ऋण की सीमा के विस्तार पर सहमति तथा बैंकिंग नीतियों में आर्थिक सुधारों के कारण हुआ है। भारत के लिए एक अन्य सकारात्मक पक्ष यह है कि चीन में अप्रैल से जून वाली तिमाही में आर्थिक स्तर पर काफी गिरावट दर्ज हुई है, क्योंकि वहां का रियल एस्टेट सेक्टर मंदी के दौर से निकल रहा है। चीन में कोरोना महामारी के सभी प्रतिबंधों को उठाने के बावजूद अभी आर्थिक वृद्धि के लिए ज्यादा सकारात्मक रुख नहीं दिख रहा है। इस परिदृश्य में पिछले तीन दशकों की भारत की आर्थिक यात्रा बहुत अविस्मरणीय रही है। ज्ञात रहे कि 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था मात्र तीन खरब डॉलर की ही थी। पिछले एक दशक में मोदी युग के दौरान भारत विश्व की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बना। अब तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लिए भारत को जापान तथा जर्मनी को पीछे छोड़ना होगा।
तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का सपना निश्चित रूप से हर भारतीय को गौरव तो महसूस करा रहा है, पर यह एक भ्रम को भी जन्म दे रहा है कि जीडीपी का आधार बढ़ने के साथ-साथ सभी भारतीयों की आय भी बढ़ेगी। जीडीपी में वृद्धि होने से भारत जैसे मुल्क में, जिसकी आर्थिक बागडोर पिछले दो-तीन दशकों से निजी क्षेत्र के कंधों पर है, आर्थिक असमानता का बहुत बढ़ना स्वाभाविक है। जरूरत इस बात की है कि हम जीडीपी के आकार को बढ़ाने के साथ-साथ आर्थिक नीतियां में प्रति व्यक्ति आय को बढ़ाने पर भी केंद्रित हों। इन दिनों भारत जनसंख्या में चीन को पीछे छोड़कर विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाला मुल्क बन गया है। पर लगातार बढ़ती बेरोजगारी तथा महंगाई की दर ने समाज के 80 प्रतिशत तबके को आर्थिक रूप से परेशानियों में डाल रखा है।
जीडीपी का आकार बड़ा होना अच्छी बात है, लेकिन हमें प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने के पहलू पर भी ध्यान देना चाहिए। अभी भारत इस मामले में दुनिया में 125वें स्थान पर है। एक दशक पहले प्रति व्यक्ति आय करीब 80 हजार रुपये सालाना थी, जो अब बढ़कर 1.70 लाख रुपये से ज्यादा हो चुकी है। हालांकि, अब भी 80 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें सरकार गरीब मानती है और उन्हें मुफ्त खाद्यान्न वितरण करती है।
अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों निर्माण, सेवा क्षेत्र, कृषि इत्यादि में सकारात्मक वृद्धि अंततः जीडीपी का आकार बढ़ाती है। परंतु हम इस बात को क्यों स्वीकार नहीं कर पाते कि किसी कंपनी के मुनाफे में होने वाली वृद्धि का न्यूनतम हिस्सा ही काम करने वाले श्रमिकों की आय में जुड़ता है। इसी कारण भारत जैसे मुल्क में अमीरों और गरीबों के बीच की खाई लगातार बढ़ रही है। महंगाई प्रति व्यक्ति आय को कैसे प्रभावित करती है, इस संदर्भ में इन दिनों टमाटर का उदाहरण बहुत समसामयिक है। इसलिए जीडीपी का आकार बढ़ाने के साथ-साथ प्रति व्यक्ति आय को भी एक आदर्श मुकाम पर ले जाना आर्थिक नीतियों का मुख्य मकसद होना चाहिए। तभी देश की अर्थव्यवस्था को विश्व में तीसरे मुकाम पर पहुंचने के सपने को सभी भारतीय दिल से देखेंगे।