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दैनिक नवज्योति

गरीबी उन्मूलन की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति

Ajmer City - 11 Nov 2022 - Page 4

एक चौंकाने वाली बात यह भी सामने आई है कि दक्षिण एशिया महाद्वीप के अंतर्गत भारत मात्र एक ऐसा मुल्क है, जहां पर उन परिवारों में बहुतायत में गरीबी पाई गई है, जहां महिला मुखिया के रूप में है। रिपोर्ट में प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार भारत में कुल 3.9 करोड़ गरीबों के घरों को महिलाओं के द्वारा ही संचालित किया जा रहा है। यह तथ्य अपने आप में इस बात को इंगित करता है कि हमारे मुल्क में महिलाओं की आर्थिक विकास में कम भागीदारी या कम आर्थिक स्वावलंबन देश के आर्थिक विकास में एक बाधा है।

इन दिनों भारतीय अर्थव्यवस्था के संबंध में बहुत कुछ सकारात्मक देखने को मिल रहा है। पहले जीडीपी के विकास की दर के आधार पर हमारी अर्थव्यवस्था ने इंगलैंड को पीछे छोड़कर विश्व की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था का तमगा हासिल किया। अब वैश्विक बहु आयामी गरीबी सूचकांक की नई रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने गरीबी उन्मूलन पर काफी अच्छा कार्य किया है। इस रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक वर्तमान समय में भारत में गरीबी की दर 16.4 प्रतिशत है। काफी सकारात्मक बात इस रिपोर्ट में यह देखने को आई है कि बीते 15 सालों में यानी कि 2005-6 से 2021-22 तक भारत में 42 करोड़ लोगों को गरीबी के जीवन स्तर से ऊपर उठाया है। निश्चित रूप से यह आंकड़ा भारत के आर्थिक विकास के लिए आदर्श स्थिति को व्यक्त करता है। इस संदर्भ में यह स्पष्ट करना भी अत्यंत आवश्यक है कि इस रिपोर्ट के अंतर्गत कोरोना महामारी के आर्थिक दुष्प्रभावों को बहुत बड़े स्तर तक सम्मिलित नहीं किया गया। भारत के संदर्भ में किए गए सर्वे का 71 प्रतिशत भाग 2019 से पूर्व का है। 2022 की इस वैश्विक बहु आयामी गरीबी सूचकांक रिपोर्ट के अंतर्गत भारत का इंडेक्स 0.069 दर्ज किया गया है। ज्ञात रहे 2006 के अंतर्गत इसी रिपोर्ट के द्वारा दिया गया इंडेक्स 0.283 था तो 2015-16 में यह 0.122 हुआ करता था। आंकड़े यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि तकरीबन 15 वर्ष पूर्व भारत में गरीबी की दर 55.1 प्रतिशत थी। 2015-16 में यह 27.7 प्रतिशत थी। यह कमी इस बात को स्पष्ट कर रही है कि भारत में आर्थिक विकास का सामूहिक प्रभाव बड़ी तेजी से देखा जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम तथा आक्सफोर्ड गरीबी व मानव विकास पहल के द्वारा तैयार की गई इस वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अंतर्गत 111 देशों को इस दफा सम्मिलित किया गया। इस रिपोर्ट के अंतर्गत मुख्यतया 3 आयामों पर फोकस किया गया है, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा तथा जीवन स्तर सम्मिलित हैं। स्वास्थ्य के अंतर्गत जहां गरीबी को पोषक पदार्थों का संग्रहण तथा बाल मृत्यु दर की मात्रा को आधार बनाया गया है। शिक्षा के अंतर्गत विद्यार्थियों की स्कूली शिक्षा की अवधि तथा स्कूली शिक्षा के दौरान उनकी उपस्थिति सम्मिलित है। जीवन स्तर के अंतर्गत खाना पकाने का ईंधन, साफ-सफाई, पीने का पानी, विद्युत की सुविधा, घर की सुविधा तथा अन्य सम्पत्तियां सम्मिलित की गई। यानी कि यह स्पष्ट है इस रिपोर्ट के अंतर्गत विभिन्न आयामों पर गरीबी दर को अनुमानित किया गया है।

इस रिपोर्ट का तार्किक विश्लेषण करने के बाद कुछ निराशाजनक बातें भी सामने आईं। खाद्य पदार्थों में सम्मिलित पोषक तत्व, खाना बनाने के लिए ईंधन, साफ-सफाई तथा घर की सुविधा के संबंध में पूरे विश्व में प्रभावित तकरीबन 4.55 करोड़ लोगों में से 3.44 करोड़ लोग भारत में रहते हैं। वहीं बांग्लादेश में यह मात्रा 21 लाख ही है और पाकिस्तान में तो 19 लाख है। आदर्श पोषक तत्व, खाना बनाने का ईंधन, साफ-सफाई तथा घर की सुविधा के आधार पर अगर गरीबी रेखा को ही आधार बनाकर चला जाए तो विश्व के 75 गरीब प्रतिशत भारत से जुड़ी हुई है। इस रिपोर्ट के द्वारा प्रस्तुत किए गए एक आंकड़े के अनुसार कुल गरीबों का 90 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या का भाग है, शेष 10 प्रतिशत शहरों से हैं। एक चौंकाने वाली बात यह भी सामने आई है कि दक्षिण एशिया महाद्वीप के अंतर्गत भारत मात्र एक ऐसा मुल्क है, जहां पर उन परिवारों में बहुतायत में गरीबी पाई गई है, जहां महिला मुखिया के रूप में है। रिपोर्ट में प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार भारत में कुल 3.9 करोड़ गरीबों के घरों को महिलाओं के द्वारा ही संचालित किया जा रहा है। यह तथ्य अपने आप में इस बात को इंगित करता है कि हमारे मुल्क में महिलाओं की आर्थिक विकास में कम भागीदारी या कम आर्थिक स्वावलंबन देश के आर्थिक विकास में एक बाधा है।

इस रिपोर्ट में यह बात भी स्पष्ट की गई है कि भारत में सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में गरीबी सबसे अधिक गरीबी का उन्मूलन गोवा के अंतर्गत हुआ है। वहीं दूसरी तरफ 2015-16 से लेकर अब तक गरीबी दर के आधार पर घोषित बीमारू राज्यों में अब पश्चिम बंगाल सम्मिलित नहीं है। बाकी बचे राज्य जिनमें बिहार, झारखंड, मेघालय, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, असम, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ व राजस्थान आज भी उसी श्रेणी में सम्मिलित हैं। अगर इस बात पर गौर किया जाए कि पिछले 15 सालों में किस तरह से इस मुल्क में करीब 42 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला तो यकीनन इसका पहला श्रेय ग्रामीण आर्थिक विकास के लिए बनाई गई योजना मनरेगा को जाता है। पिछले 15 वर्षों से सरकारों ने प्रत्येक वर्ष के वित्तीय बजट के अंतर्गत इस योजना पर अपने खर्च को निरंतर बढ़ाया है जिसका लाभ जमीनी स्तर पर भारत के गरीब तबके के व्यक्ति को हुआ है।

-डॉ. पी.एस. वोहरा

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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As printed in दैनिक नवज्योति.