दैनिक नवज्योति
अमेरिका में बैंकिंग नीतियां गलत राह पर
अक्सर ये कहा जाता है कि अमेरिका की मंदी का अंदेशा दूसरे देशों को पहले ही निराशा के दौर में ले जाता है। भारत की अर्थव्यवस्था के संबंध में सकारात्मक बात ये है कि यहां बैंकिंग नीतियों का सख्त पालन होता है, उसमें चाहे बेसल तीन के नियम हो या अन्य महत्वपूर्ण सूचनाएं। उन सभी का अनुपालन सभी बैंकों को करना जरूरी होता है। इसलिए ये कहना लाजमी होगा कि भारतीय बैंकिंग पूर्णतया सुरक्षित है तथा अर्थव्यवस्था की मजबूत धूरी है।
इन दिनों अमेरिका के सिलिकॉन वैली बैंक की एकाएक हुई आर्थिक तबाही ने पूरे विश्व को हिला कर रख दिया है। सिर्फ 5 दिनों में ही ये बैंक दिवालिया घोषित हो गया। यहां पर ये बात भी गौर करने वाली है कि कोरोना महामारी के दौरान जब अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्र गिरावट के दौर में थे तब अमरीका में इस बैंक की डिपॉजिट्स या जमाओं में बेतहाशा वृद्धि देखी गई थी। फिर ऐसा क्या हुआ कि ये बैंक जोकि अमेरिकन टेक्नोलॉजी वाले स्टार्टअप्स की मुख्य आय का स्रोत था वो धड़ाम से नीचे गिर गया? 1983 में इस बैंक की स्थापना हुई तथा अपनी स्थापना के 5 वर्ष बाद 1988 में आईपीओ के द्वारा अमेरिकन स्टॉक मार्केट में नैस्डेक पर ये लिस्टेड हुआ। 1996 से इसने अमेरिका के 15 बड़े राज्यों में बैंकिंग व्यापार करना शुरू कर दिया तथा 2008 से तो ये विभिन्न देशों में भी अपना विस्तार कर चुका था।
यहां पर ये स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है कि किसी भी बैंक की वित्तीय असफलता या दिवालियापन की कगार पर पहुंचने के दो मुख्य कारण हो सकते हैं। पहला, दिए गए वित्तीय ऋणों का वापस ना आना और एनपीए बन जाना। दूसरा, जमाकर्ताओं द्वारा स्वयं ही अपनी जमा राशि को बैंक से एकाएक निकालना। सामान्य रूप से पहला विकल्प किसी भी बैंक के फेलियर पर ज्यादा चर्चा में रहता है और शायद इसी कारण बैंक की ऋण पॉलिसी पर किसी भी देश के केंद्रीय बैंक का चुस्त सुपरविजन रहता है ताकि बैंकों की आर्थिक घबराहट का समाज पर कोई असर ना पड़े। विकल्प नंबर दो जोकि बहुत प्रचलन में नहीं रहता है वो अगर घटित होता है तो निश्चित तौर पर समाज को ये जानने का हक है कि इसके पीछे का मुख्य दोषी कौन है? सिलीकान वैली बैंक की आर्थिक बर्बादी विकल्प नंबर दो के कारण हुई है। बैंक की आधिकारिक वेबसाइट पर अब तक इस बात के तथ्य उपलब्ध है कि उसकी कुल जमाएं 342 बिलीयन अमेरिकन डॉलर की है जबकि उसके द्वारा दिए गए वित्तीय ऋण मात्र 74 बिलीयन डॉलर के थे और उसके पास 212 बिलियन डॉलर की विभिन्न संपत्तियां संपतिया भी हैं। लेकिन बैंक में हुआ बिल्कुल विपरीत। पहले तो सरकारी प्रतिभूतियों में किए गए अपने निवेश के विक्रय पर बैंक को एक ही दिन में 180 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ। इस कदम से इस बात की सुगबुगाहट फैली कि बैंक के पास वित्तीय तरलता की बड़ी तेजी से कमी हो रही है जिसके परिणाम स्वरूप एक ही दिन में निवेशकों ने अपनी 40 बिलीयन अमेरिकन डॉलर की वित्तीय जमाओं को बैंक से निकाला। इस कदम के कारण बैंक में बड़ी तेजी से नकदी की कमी होती चली गई और परिणाम स्वरूप बैंक को दिवालिया घोषित कर दिया गया।
वास्तविकता में सिलिकॉन वैली बैंक के इस एपिसोड के पीछे का मुख्य कारण अमेरिका की आर्थिक नीतियों में पिछले दिनों हुए बदलाव है। कोरोना के दौरान जब ब्याज की दरें बहुत कम थी ताकि प्रति व्यक्ति क्रय क्षमता बरकरार रहे तो उस दौरान अमेरिकन टेक्नोलॉजी स्टार्टअप्स के पास काफी वित्तीय निवेश था जिसे उन्होंने सिलीकान वैली बैंक में एक अच्छी रिटर्न के एवज में लगातार जमा कराया। इसके परिणाम स्वरूप बैंक की जमाओं में एक ही वर्ष की अवधि में दुगनी वृद्धि दर्ज हुई। महामारी बीतने के बाद चालू वित्तीय वर्ष 2022-23 में अमेरिकन फेड ने एकाएक अपनी आर्थिक नीतियों को बदल दिया तथा डॉलर को तुलनात्मक रूप से विश्व की सभी दूसरी मुद्राओं के मुकाबले मजबूत करने के लिए अमेरिकन ब्याज दरों में बहुत वृद्धि कर दी। इसके पीछे का मुख्य कारण आसमानी स्तर पर पहुंच गई महंगाई की दर को नीचे लाना भी था। इस नीति का वित्तीय दुष्प्रभाव एकाएक सिलीकान वैली बैंक की आर्थिक नीतियों पर पड़ा जिसका शायद पूर्वानुमान ना तो अमेरिकन फेड ने किया था व ना ही सिलिकॉन वैली बैंक ने। जब सिलीकान वैली बैंक को अमेरिकन टेक्नोलॉजी स्टार्टअप्स के द्वारा खूब वित्तीय जमाएं मिल रही थीं तो उसने उनका निवेश अमेरिकन सरकारी प्रतिभूतियों या बॉन्ड्स में कर दिया था, क्योंकि उस दौरान उन में ब्याज की दर काफी आकर्षक थी। इस संदर्भ में ये बात भी बतानी उचित होगी कि इस बैंक में प्रति निवेशक जमा की राशि 250000 अमेरिकन डॉलर थी जोकि छोटे बैंकों की तुलना में काफी अधिक थी। दूसरी मुख्य समस्या इस बैंक के साथ ये रही कि इस बैंक के निवेशक मात्र टेक्नोलॉजी वाली कंपनियों से ही आते थे और पिछले कुछ अर्से से टेक्नोलॉजी वाली कंपनियों या स्टार्टअप्स में आर्थिक संकट का दौर देखा जा रहा है जिसके परिणाम स्वरूप उन सभी में अपनी वित्तीय जमाओं के प्रति एक बेचैनी सदैव बनी हुई थी।
ये बताना भी उचित होगा कि भारतीय इतिहास में बैंकिंग का फेलियर बहुत कम देखने को मिलता है और अगर कोई उदाहरण सामने भी आता है तो उसके तुरंत बाद भारतीय केंद्रीय बैंक के द्वारा बैंकों की नीतियों को बहुत पारदर्शी बना दिया जाता है तथा उसका अनुपालन सभी छोटे व बड़े बैंकों को आवश्यक रूप से करना होता है।
-डॉ. पीएस वोहरा
(ये लेखक के अपने विचार हैं)