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राजस्थान टुडे

सपनों का कारोबार , किसकी कीमत पर ?

यूनिकॉर्न के पीछे छिपा संकटः नवाचार से प्रतिस्पर्धा तक

अगस्त, 2025

> भारत में स्टार्टअप्स की तेज रफ्तार ने दुनिया का ध्यान खींचा है। 2016 में 500 से शुरू हुई यह गिनती आज 1.59 लाख तक पहुंच चुकी है और 115 यूनिकॉर्न तैयार हो चुके हैं। लेकिन यह चमक एक गहरे संकट को भी जन्म दे रही है। छोटे व्यापारी दबाव में हैं, कर रियायतों और जीएसटी की हानि से सरकार का खजाना प्रभावित हो रहा है और निवेशकों के दबाव में कई स्टार्टअप्स आक्रामक मूल्यांकन की ओर बढ़ रहे हैं। क्या यूनिकॉर्न का यह सपना भारतीय व्यापारिक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा बन सकता है? सरकार भी संकेत दे रही है कि आने वाले समय में नीतिगत सख्ती देखने को मिल सकती है।

'स्टार्टअप' शब्द अब युवाओं के सपनों के शब्दकोश का हिस्सा बन चुका है। भारत आज वैश्विक स्तर पर स्टार्टअप्स की दौड़ में अमेरिका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर है। 16 जनवरी 2016 को राष्ट्रीय स्टार्टअप दिवस की शुरुआत के बाद पिछले नौ वर्षों में इनकी संख्या 500 से बढ़कर करीब 1,59,000 हो गई है। रोजगार के मोर्चे पर ये लगभग 17 लाख अवसर उपलब्ध करा चुके हैं। 70 हजार से अधिक स्टार्टअप्स में महिलाएं नेतृत्व कर रही हैं, जो महिला सशक्तिकरण का भी संकेत है। जिन स्टार्टअप्स का वित्तीय मूल्यांकन एक अरब डॉलर से अधिक हो गया, उन्हें 'यूनिकॉर्न' कहा जाता है। आज भारत में 115 यूनिकॉर्न हैं और कई स्टार्टअप्स ने स्टॉक मार्केट में उतरकर खुद को सार्वजनिक कम्पनियों में भी बदला है।

कड़वी सच्चाई… स्टार्टअप्स की शुरुआत समाज की बड़ी समस्याओं को तकनीकी नवाचारों से हल करने के उद्देश्य से होती है। लेकिन धीरे-धीरे इनमें बड़े औद्योगिक घरानों का निवेश बढ़ता है और मुनाफे की होड़ हावी होने लगती है। स्टार्टअप्स मुख्यतः दो स्रोतों से कमाई करते हैं– ग्राहकों के व्यवहार और पसंद-नापसंद से जुड़ा डाटा इकट्ठा करना तथा निवेशकों से वित्तीय निवेश। समय के साथ ये छोटे व्यापारों के लिए बड़ी चुनौती बन जाते हैं, जिससे लघु व्यापारों की आजीविका प्रभावित होती है।

सरकार को आर्थिक नुकसान… स्टार्टअप्स को सरकार ने कर रियायतों के रूप में कई प्रोत्साहन दिए हैं, लेकिन अब इनके तौर-तरीके सरकारी राजस्व को भी प्रभावित कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, पहले एक स्थानीय व्यापारी 100 रुपये में कोई उत्पाद बेचता था तो उस पर 18 रुपये जीएसटी लगता था। अब बड़े स्टार्टअप्स वही उत्पाद 50 रुपये में बड़े पैमाने पर खरीदते हैं, जिससे उसका मुनाफा घटता है और सरकार को जीएसटी राजस्व में कमी आती है। छोटे व्यापारों को तकनीकी प्लेटफार्म से जोड़ने के बजाय कई स्टार्टअप्स आज उनसे प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं और अपने खुद के रिटेल स्टोर स्थापित कर रहे हैं। वे डिस्काउंट पर उत्पाद बेचकर निवेशकों का नुकसान कर रहे हैं और बाजार में पकड़ बनाने के बाद डिलीवरी चार्ज के रूप में ग्राहकों से अतिरिक्त वसूली कर रहे हैं। यह भारतीय व्यापार परम्परा को कमजोर कर रहा है।

यूनिकॉर्न बनने की होड़

स्टार्टअप से यूनिकॉर्न बनने का रास्ता पूरी तरह वित्तीय मूल्यांकन पर निर्भर करता है। वित्तीय विशेषज्ञ भी मानते हैं कि मूल्यांकन के लिए पारदर्शी नियम अभी मौजूद नहीं हैं। कुछ वर्ष पहले एक प्रसिद्ध भारतीय स्टार्टअप में चीनी निवेश के बाद उसका मूल्यांकन अचानक बढ़ गया था, जो निवेशकों के हितों को सुरक्षित करने के लिए किया गया था। आईपीओ के बाद कई यूनिकॉर्न के मूल्यांकन में गिरावट देखने को मिली है। यह भी देखा गया है कि सार्वजनिक कम्पनियां बनने के बाद संस्थागत इक्विटी की जगह रिटेल निवेशकों की इक्विटी आ जाती है और स्टार्टअप मालिक समय रहते भारी मुनाफा सुरक्षित कर लेते हैं। शोध और विकास में कम निवेश भी भारतीय स्टार्टअप्स की बड़ी कमजोरी है।

अब बदलाव का संकेत

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल का यह बयान कि "भारतीय स्टार्टअप्स ने बेरोजगार युवाओं को सस्ते मजदूरों में बदल दिया है, जो अमीरों के घरों में खाना पहुंचाने की कतार में खड़े हैं", एक सच्चाई को उजागर करता है। बेरोजगार युवाओं के पास सीमित विकल्प हैं, लेकिन यह बयान साफ संकेत देता है कि सरकार अब नीतियों में बदलाव की तैयारी कर रही है। आने वाले समय में स्पेस टेक्नोलॉजी, कृषि क्षेत्र और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों पर सरकार का ध्यान बढ़ेगा। कर प्रोत्साहन और अन्य वित्तीय सुविधाओं से जुड़ी नई नीतियां भी लागू हो सकती हैं।

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As printed in राजस्थान टुडे. Original e-paper page (may have expired).