Skip to content
Latest

विषमता की परतें

Date of publication not recorded on the clipping

हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के एक प्रमुख हिस्से उत्तर प्रदेश के नोएडा में मजदूरों की हड़ताल चर्चा में रही और इसका मुख्य कारण उनकी न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने की मांग थी। कुछ दिनों तक चली ये हड़ताल आखिर में हिंसक हो गई और इसके चलते गरीब मजदूरों के पक्ष में समाज का संवेदनात्मक रुख मुड़कर 'निंदनीय' हो गया। यह सही है या गलत, इसका विश्लेषण व्यक्ति को खुद ही करना होगा, पर अब यह समझना आवश्यक है कि आज भारतीय समाज क्या उस मोड़ पर आकर नहीं खड़ा हो गया है, जहां आर्थिक विषमता एक बहुत बड़ा संकट बन चुकी है?

वास्तव में भारत एक गरीब मुल्क है, चाहे वह चार ट्रिलियन की बड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था बन गया हो और इन दिनों डालर के सामने रुपए की गिरावट के चलते छठे स्थान पर आ गया हो। क्या इस तरक्की के साथ भारत के गरीब व्यक्ति का, उसके आर्थिक जीवन स्तर का, जो दशकों से संघर्षों से भरा हुआ है, कोई तालमेल दिखता है? यह बेवजह नहीं है कि एक लंबे अरसे से मजदूरों के मन में अपनी न्यूनतम मजदूरी को बढ़ाने और एक सम्मानजनक जीवन जीने की प्रबल इच्छा उनकी मांग बन गई और वे सड़कों पर हड़ताल करने के लिए उतर गए।

मजदूरों की मुख्य मांगों में न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी, समय पर वेतन, आपातकालीन चिकित्सा सुविधा, साप्ताहिक अवकाश, महिला श्रमिकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार, आठ घंटे से ज्यादा काम करने पर दोगुना ओवरटाइम वेतन और वक्त पर वार्षिक बोनस शामिल था। इन मांगों का अपना औचित्य है, लेकिन सच्चाई का एक पक्ष यह भी है कि मजदूर हड़ताल करने के लिए इसीलिए उतारू हुए कि वे बढ़ती आर्थिक असमानता, जिसके अंतर्गत कंपनियों के मुनाफों में वृद्धि और मालिकों की अमीरी के लगातार बढ़ते स्तर को भी देख रहे थे। इन सबके बीच एक सम्मानजनक जीवन जीने के लिए मजदूर भी अपने वेतन में बढ़ोतरी की मांग कर रहे थे।

यह छिपा नहीं है कि एक मजदूर का औसत वेतन दस से बारह हजार है, जिसमें कई बार उसे तकरीबन बारह घंटे श्रम करना पड़ता है। वहीं महंगाई पर नियंत्रण सरकार का नहीं है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण गैस सिलेंडर के बढ़ते मूल्य हैं, जो अब मजदूरों की पहुंच से बाहर जा रहा है। एक कमरे के मकान में रहने वाले मजदूरों का मासिक किराया तीन से चार हजार रुपया होता है, जो उनके वेतन का करीब 40 फीसद होता है। बाकी बचा हुआ हिस्सा खाने-पीने के राशन, बच्चों की शिक्षा पर खर्च हो जाए और अगर बुजुर्ग माता-पिता आश्रित हों या छोटे भाई-बहन भी, तो उनका गुजर-बसर कैसे होगा? स्थिति और भी गंभीर है कि जब भी मजदूर अपने हक की मांग करता है, तो उसे नौकरी से निकालने की धमकी दी जाती है। कई रपटों के आंकड़े ये भी सामने आए कि आंदोलन के बाद कई कर्मचारियों को काम मिलना बंद हो गया।

सरकारी संस्थान, सेंटर फार मानिटरिंग इंडियन इकोनामी (सीआइएमई) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पिछले छह वर्षों में मजदूरों को उत्पादन (विक्रय और भंडार में बदलाव) का 5.16 फीसद का हिस्सा घटकर अब 4.97 फीसद रह गया है। वर्ष 1991 में यह हिस्सा सात फीसद से अधिक हुआ करता था। आर्थिक समीक्षा 2024-25 के अंतर्गत यह भी बताया गया कि पिछले पंद्रह वर्षों में कंपनियों का कर चुकाने के बाद का लाभ 149 फीसद बढ़ा है, जबकि कर्मचारियों का वेतन मात्र 52 फीसद। भारत के कई बड़े शहरों में कारखानों में काम करने वाले कर्मचारी को अब ठेकेदारों के माध्यम से ही रखा जाता है। वर्ष 2000 तक ऐसे कर्मचारियों की तादाद 16 फीसद हुआ करती थी, जो अब 42 फीसद हो गई है। और इन सबकी वजह से कर्मचारी फैक्टरी के मालिकों से प्रत्यक्ष बात नहीं कर पाते, क्योंकि उनके बीच कोई अनुबंध नहीं होता है और ठेकेदार कभी भी कर्मचारी का साथ नहीं देता।

एक रपट में ये तथ्य दर्ज हैं कि निर्माण क्षेत्र के अंतर्गत उम्र बढ़ने पर वेतन कम होने लगता है। 15 से 25 वर्ष तक की आयु के बीच निर्माण क्षेत्र में अन्य क्षेत्रों की तुलना में मजदूरों का वेतन अधिक है, पर 25 वर्ष से लेकर 50 वर्ष की आयु के बीच में अन्य क्षेत्रों की तुलना निर्माण क्षेत्र के अंतर्गत मजदूरों के वेतन में 15 फीसद से लेकर 25 फीसद तक कमी देखी जाती है। अब इस पक्ष पर यह क्यों नहीं समझा जा रहा कि व्यक्ति पर इस आयु के दौरान पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ता है, तो वह निर्माण क्षेत्र के अंतर्गत कम वेतन पर अपनी जिम्मेदारियां कैसे उठा पाएगा! हाल की हड़ताल के संदर्भ में सोशल मीडिया पर मजदूरों के कई तरह के व्यक्तिगत अनुभव देखने में आए, जिसके अंतर्गत दो दिन काम करने पर मात्र 971 रुपए मिलना, साल भर के बाद भी मात्र 29 रुपए का वेतन बढ़ाना आदि। ये सब इस बात की गवाही है कि कारखानों में मजदूरों को सम्मानजनक जीवन उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा, सौ से अधिक श्रमिक वाले कारखानों को सबसिडी वाला भोजन अपने मजदूरों को उपलब्ध करवाना होता है, लेकिन अधिकतर कारखाने ऐसा नहीं करते हैं।

भारतीय औद्योगिक समाज में लागत को नियंत्रित करने के लिए प्रथम प्राथमिकता कर्मचारी या श्रमिकों के वेतन पर नियंत्रण होती है, क्योंकि अन्य पक्षों और मालिकों को महंगाई का प्रभाव दिखता है। शायद इस पक्ष पर अब एक दूरदर्शिता की जरूरत देश के सामने है, जिसके अंतर्गत एमएसएमई इकाइयों को शत-प्रतिशत की क्षमता पर कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और उसका अधिक लाभ मिले, जिसके अंतर्गत मजदूरों का आर्थिक हित भी सुरक्षित हो। भारत अभी इस पक्ष पर इसलिए असुरक्षित महसूस करता है कि वह निर्यात में अधिक बढ़ोतरी पर आशंकित रहता है। मगर बीते दशकों में चीन ने ऐसा ही करके अपनी बादशाहत को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया है।

The article as printed
As printed.