राजस्थान पत्रिका
देश को मनरेगा जैसी एक और योजना की जरूरत
आर्थिक रूप से पिछड़े ग्रामीणों का मनरेगा अब भी बड़ा सहारा है
कुछ समय पहले जारी वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक की एक रिपोर्ट में यह बताया गया था कि भारत में गरीबी की दर 16.4 प्रतिशत है, जबकि 15 वर्ष पूर्व भारत में गरीबी की दर 55.1 प्रतिशत थी। इस रिपोर्ट के अनुसार बीते 15 सालों में यानी कि 2005-6 से 2021-22 के दौरान 42 करोड़ लोग भारत में गरीबी रेखा से बाहर निकले हैं। उधर लगातार बढ़ती जा रही बेरोजगारी की दर से यह सवाल उठता है कि क्या गरीबी दर में इसी तरह से तीव्र कमी को हम भविष्य में भी दर्ज कर पाएंगे?
वर्तमान में आर्थिक वातावरण अनिश्चितता से घिरा हुआ है, क्योंकि आर्थिक नीतियों में समावेशी विकास का उद्देश्य स्पष्टता लिए हुए नहीं है। निजीकरण की सोच के प्रति झुकाव ने जहां अर्थव्यवस्था को तेजी दी, वहीं आर्थिक विषमता की समस्या को भी विकट बना दिया। आर्थिक असमानता आर्थिक विकास में बाधक है और सामाजिक समरसता के लिए भी एक बड़ी समस्या है। यह आम सोच बनती जा रही है कि अमीर के पास आर्थिक संपन्न होने के अधिक अवसर रहते हैं। यह अफसोसजनक है कि कोरोना महामारी के आर्थिक दुष्प्रभावों ने भी भारतीय समाज में आर्थिक असमानता को खूब बढ़ाया। महामारी के दौरान भी गरीब और अमीर के बीच की खाई और बढ़ गई। ध्यान रहे, भारत के सामने आज भी चुनौतियां अधिक और अवसर कम हैं। यह भी तथ्य है कि ज्यादातर लोग अपनी आय की निरंतरता को लेकर आश्वस्त नहीं हैं।
बेरोजगारी का शत प्रतिशत निवारण कभी भी संभव नहीं है, परंतु लगातार बढ़ रही बेरोजगारी आर्थिक विकास की दर को नकारात्मक भी कर सकती है। इससे प्रत्यक्षतः व्यक्ति की क्रय क्षमता प्रभावित होती है और फिर शुरुआत होती है मंदी के आगमन की, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान होता है। वास्तविकता में भारत को समग्र आर्थिक विकास के लिए मनरेगा जैसी एक और योजना की जरूरत है, जो कि गरीब परिवारों को आर्थिक संबल प्रदान कर सके। ज्ञात रहे कि मनरेगा ने वर्ष 2006 से अब तक लगातार भारत में ग्रामीण विकास के लिए ऐतिहासिक कार्य किया है। आज तकरीबन 30 करोड़ आर्थिक रूप से पिछड़े ग्रामीण लोगों का मनरेगा बड़ा आर्थिक सहारा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार चालू तिमाही में पिछली तिमाही से करीब 20 प्रतिशत अधिक का रुझान मनरेगा में दर्ज हो रहा है। यह भी ज्ञात रहे कि चालू वित्तीय वर्ष के बजट में मनरेगा के लिए तकरीबन 73,000 करोड़ रुपए का वित्तीय प्रावधान है। अगर अब आने वाली नीतियों में इसी तरह की एक अन्य आर्थिक योजना शुरू की जाए, जिसके माध्यम से समाज में आर्थिक रूप से पिछड़ों, बेरोजगारों और असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्तियों को एक निश्चित धनराशि की आर्थिक सुविधा दी जाए, तो उससे जहां एक तरफ गरीबी की समस्या पर चोट होगी, तो वहीं दूसरी तरफ क्रय क्षमता में बढ़ोतरी होगी, जिससे आर्थिक विकास का चक्र तेजी से आगे बढ़ेगा।
सबसे सकारात्मक बात यह भी है कि आज हर भारतीय के पास उसकी पहचान के लिए आधार है तथा जनधन योजना के बाद से बैंकिंग व्यवस्था के साथ भी ज्यादातर लोगों का जुड़ाव हुआ है। इसके अलावा डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर योजना के माध्यम से समाज के ऐसे पिछड़े तबके को चिह्नित करके प्रत्यक्ष आर्थिक फायदा दिया जा सकता है। इस संदर्भ में यह चिंता व्यर्थ है कि क्या नकद आर्थिक सहायता देना कभी भी रोजगारों के सृजन का विकल्प बन सकती है? इस बात का विश्लेषण भी जरूरी है कि इसके माध्यम से अर्थव्यवस्था पर कितना आर्थिक बोझ आएगा, परंतु उस आर्थिक बोझ का समाधान ऐसी कराधान प्रणाली से हो सकता है, जो मध्यमवर्गीय लोगों को आर्थिक रूप से प्रभावित न करती हो और न ही महंगाई बढ़ाने का प्रत्यक्ष कारण बने।