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अमर उजाला

पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली

आधारभूत संरचनाओं के विकास के साथ ही पाकिस्तान को निजी क्षेत्र के निवेश को आकर्षित करना चाहिए, ताकि विदेशी सहायता पर निर्भरता कम हो।

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इन दिनों वैश्विक चर्चा है कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था काफी अस्थिर हो चुकी है। इसका मुख्य कारण पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था में लगातार बढ़ रहा विदेशी ऋण है। यह स्थिति एशिया महाद्वीप में इसलिए भी चिंताजनक हो जाती है, क्योंकि कमोबेश इसी कारण एक अन्य पड़ोसी मुल्क श्रीलंका भी इन दिनों आर्थिक बर्बादी के कगार पर है।

कुछ दिनों पहले पाकिस्तान सरकार ने कहा कि उसे आगामी वित्त वर्ष के लिए 42 अरब डॉलर की आवश्यकता होगी, जिसमें से 21 अरब डॉलर तो विदेशी ऋण के भुगतान के लिए चाहिए। 12 अरब डॉलर चालू खाते के घाटे को पूरा करने के लिए तथा नौ अरब डॉलर आगामी वित्तीय वर्ष के अंतर्गत आवश्यक वस्तुओं के आयात के भुगतान के लिए। पाकिस्तान विद्युत की आवश्यक मांग भी पूरा नहीं कर पा रहा है, लगभग 7,800 मेगावाट की आपूर्ति नहीं हो पा रही है, जिसके फलस्वरूप आम आदमी का जीवन तथा व्यापार व कारखाने सभी प्रभावित हो रहे हैं। जुलाई के अंतिम सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार में भी 756 अरब डॉलर की कमी दर्ज की गई है तथा विदेशी मुद्रा भंडार 85.75 करोड़ डॉलर ही है, जो डेढ़ माह के आयात भुगतान में ही सक्षम है।

पाकिस्तान की मुद्रा रुपये में भी लगातार अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरावट आ रही है और पिछली 29 जुलाई को यह 239 रुपये पर आ गया था, जो अब तक की सबसे बड़ी गिरावट थी। यह इस बात का प्रतीक है कि पाकिस्तान में आर्थिक संकट व्यापक रूप से गहरा रहा है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक, पाकिस्तान में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या 39 प्रतिशत के आसपास है। दूसरी तरफ अगर बेरोजगारी दर की बात की जाए, तो वह भी लगातार बढ़ रही है। पाकिस्तान बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, दवाइयां तथा खाद्य पदार्थों का आयात करता है। अगर उसका विदेशी मुद्रा भंडार इसी तरह लगातार कम होता रहा, तो वह आम आदमी के जीवन को अवश्य प्रभावित करेगा।

आज एशिया में दूसरी सबसे तेज मुद्रास्फीति की दर पाकिस्तान की है, जिस पर काबू पाने के लिए देश का केंद्रीय बैंक संघर्ष कर रहा है। इसकी वजह है कि पाकिस्तान आर्थिक नीतियों में संतुलन लाने तथा समय के हिसाब से बदलाव लाने में सक्षम नहीं हो पाया। निर्यात के आंकड़ों में भी पिछले 10 वर्षों में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। अर्थव्यवस्था में इससे मुद्रा की तरलता में लगातार कमी हुई है।

आजादी के बाद के दो-तीन दशकों तक पाकिस्तान की वार्षिक वृद्धि दर भारत की तुलना में काफी ठीक रही थी, लेकिन 90 के दशक के बाद से इसमें लगातार गिरावट देखी गई। इसी कारण पिछले 25- 30 वर्षों में जहां भारत पांच गुना अधिक आर्थिक समृद्ध हुआ, वहीं पाकिस्तान में आर्थिक समृद्धि दोगुनी ही हो पाई। प्रति व्यक्ति आय की बात की जाए, तो वर्ष 2020 में भारत में यह 1,928 डॉलर थी, जबकि पाकिस्तान में यह 1,190 डॉलर थी।

भारत व पाकिस्तान इन दिनों अपनी आजादी की 75 वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, लेकिन दोनों की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा अंतर स्पष्ट दिखता है। भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे तेजी से बढ़ने वाली दूसरी अर्थव्यवस्था मानी जाती है तथा भारत की विशाल जनसंख्या की उपभोग क्षमता दुनिया की हर बड़ी कंपनी को प्रभावित करती है।

आज जरूरत है कि पाकिस्तान आधारभूत संरचनाओं के विकास के तहत छोटे शहरों को विकसित करे, कृषि के लगातार गिर रहे अंशदान को आधुनिक प्रबंधन के तरीकों से बढ़ाए और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए अधिक से अधिक अनुसंधान पर जोर दिया जाए। पाकिस्तान को निजी क्षेत्र के निवेश को भी आकर्षित करना चाहिए, ताकि विदेशी सहायता पर निर्भरता कम हो। भारत ने समय से पहले ही सौर ऊर्जा क्षेत्र में बहुत तेजी से काम किया। यही सोच पाकिस्तान भी रखता, तो उसे बिजली की समस्याओं से नहीं जूझना पड़ता। एक सच्चाई यह भी है कि पाकिस्तान में कई बार सैन्य तानाशाही शासन के चलते लोकतंत्र मजबूत नहीं हो पाया, जिसके कारण वहां जनहित को कभी प्राथमिकता नहीं दी गई।

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As printed in अमर उजाला.