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पॉडकास्ट स्टूडियो : सीखने, बोलने और दुनिया से जुड़ने का एक जीवंत मंच
In school education
जहाँ विचारों को आवाज़ मिलती है और सीखना संवाद बन जाता है।
एसटीबीए में मैंने हमेशा यह प्रयास किया है कि विद्यार्थियों को सीखने और स्वयं को अभिव्यक्त करने के ऐसे अवसर मिलें, जो उन्हें केवल कक्षा और पाठ्यपुस्तक तक सीमित न रखें। इसी सोच के साथ विद्यालय में स्थापित किया गया पॉडकास्ट स्टूडियो आज मेरे लिए उन पहलों में से एक है, जिससे मुझे सबसे अधिक संतोष मिलता है।
इस पहल के पीछे एक बहुत सुंदर कहानी है, जिसका श्रेय मैं हमारे पूर्व विद्यार्थी पुलकित को देना चाहूँगा।
कुछ वर्ष पहले कक्षा 12 के विद्यार्थियों के साथ एक बैठक में मैंने उनसे पूछा था कि यदि उन्हें विद्यालय में कुछ नया शुरू करने का अवसर मिले, तो वे क्या करना चाहेंगे। उसी बातचीत के दौरान पुलकित ने सुझाव दिया, “हमारे विद्यालय में पॉडकास्ट स्टूडियो होना चाहिए।”
मुझे यह विचार तुरंत अच्छा लगा। हमने उस सुझाव को केवल बातचीत तक सीमित नहीं रखा और धीरे धीरे उसे वास्तविकता में बदलने की दिशा में काम शुरू किया। विद्यालय में पॉडकास्ट स्टूडियो स्थापित हुआ और समय के साथ यह एक ऐसी पहल बन गई, जिसकी कल्पना शायद उस दिन पुलकित ने भी नहीं की होगी।
आज मुझे खुशी है कि उस एक विद्यार्थी के विचार से शुरू हुई इस यात्रा में 300 से अधिक पॉडकास्ट दर्ज किए जा चुके हैं।
मेरे लिए यह संख्या अपने आप में महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है कि इस स्टूडियो ने हमारे विद्यार्थियों और शिक्षकों को सीखने, बोलने, प्रश्न करने और अपने विचार साझा करने का एक नया मंच दिया है।
पॉडकास्ट : बोलने से कहीं अधिक, सीखने का माध्यम
मेरे लिए पॉडकास्ट केवल कैमरे के सामने बोलने का अवसर नहीं है। इसके पीछे पूरी सीखने की प्रक्रिया जुड़ी हुई है।
जब कोई विद्यार्थी किसी विषय पर पॉडकास्ट तैयार करता है, तो उसे उस विषय को समझना पड़ता है, जानकारी जुटानी पड़ती है, प्रश्न तैयार करने पड़ते हैं और फिर सामने बैठकर संवाद करना पड़ता है।
इस पूरी प्रक्रिया में वह स्वाभाविक रूप से अध्ययन, संवाद, प्रश्न पूछना, सुनना, विचार करना और अपनी बात प्रभावी ढंग से रखना सीखता है।
इसी कारण मैं पॉडकास्ट स्टूडियो को केवल एक तकनीकी सुविधा नहीं, बल्कि सीखने और अभिव्यक्ति की एक जीवंत प्रयोगशाला मानता हूँ।
शिक्षक भी, विद्यार्थी भी
इस पहल की एक विशेष बात यह है कि इसमें केवल विद्यार्थी ही भाग नहीं लेते। हमारे शिक्षक भी नियमित रूप से पॉडकास्ट में भाग लेते हैं।
पॉडकास्ट की मेजबानी के लिए मैंने शिक्षकों को स्वयं आगे आने और अपनी रुचि के अनुसार अपना नाम देने का अवसर दिया है। मेरा मानना है कि शिक्षक को भी सीखने और अपनी बात रखने के लिए मंच मिलना चाहिए।
आज यह देखकर अच्छा लगता है कि शिक्षक स्वयं पॉडकास्ट की मेजबानी करने के लिए आगे आते हैं और नए विषयों पर तैयारी करते हैं।
विद्यालय आने वाला हर विशिष्ट अतिथि एक संवाद लेकर जाए
समय के साथ हमने एक और परंपरा विकसित की है। विद्यालय में आने वाले लगभग हर विशिष्ट अतिथि और विशेषज्ञ से पॉडकास्ट के माध्यम से संवाद करने का प्रयास किया जाता है।
शिक्षा, साहित्य, उद्योग, प्रशासन, कला अथवा किसी अन्य क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति जब विद्यालय आते हैं, तो विद्यार्थियों को उनके अनुभव और विचार सीधे सुनने का अवसर मिलता है।
इस प्रकार विद्यालय में आने वाला प्रत्येक विशिष्ट व्यक्ति केवल एक अतिथि बनकर नहीं जाता, बल्कि अपने विचारों और अनुभवों का एक हिस्सा विद्यार्थियों के लिए छोड़ जाता है।
विद्यार्थियों के अपने विषय और अपने सवाल
मुझे सबसे अधिक खुशी तब होती है जब विद्यार्थी स्वयं आगे आकर किसी विषय पर पॉडकास्ट करने की इच्छा व्यक्त करते हैं।
वे आज के प्रासंगिक विषयों, शिक्षा, समाज, तकनीक, कला, खेल, करियर और अपने आसपास हो रही घटनाओं पर बातचीत के लिए तैयारी करते हैं।
और यह पहल केवल बड़ी कक्षाओं तक सीमित नहीं है।
जब कक्षा 4 और 5 के छोटे बच्चे भी पॉडकास्ट के लिए आगे आते हैं, अपने प्रश्न तैयार करते हैं और कैमरे के सामने पूरे आत्मविश्वास से अपनी बात रखते हैं, तो मुझे लगता है कि इस पहल का उद्देश्य सही दिशा में जा रहा है।
आज वे छोटे बच्चे हैं, लेकिन जिस तरह वे अपने विचार व्यक्त करने का अभ्यास कर रहे हैं, मुझे पूरा विश्वास है कि आने वाले समय में उनमें से कई आत्मविश्वासी और प्रभावशाली वक्ता बनेंगे।
विद्यालय से बाहर तक पहुँचती विद्यार्थियों की आवाज़
पॉडकास्ट की प्रस्तुतियों को विद्यालय के सामाजिक माध्यमों पर भी साझा किया जाता है। इससे विद्यार्थियों को यह अनुभव मिलता है कि उनकी बात केवल विद्यालय के भीतर सुनने वालों तक सीमित नहीं है। वे अपने विचारों को व्यापक समाज के सामने भी रख सकते हैं।
यह अनुभव उनके आत्मविश्वास को एक अलग स्तर पर ले जाता है।
मेरा उद्देश्य केवल अच्छे वीडियो बनाना नहीं है। मेरा उद्देश्य है कि विद्यार्थी अच्छे श्रोता, अच्छे प्रश्नकर्ता और प्रभावशाली वक्ता बनें।
पुलकित के एक विचार से 300 से अधिक संवादों तक
आज जब मैं इस यात्रा को पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे फिर वही कक्षा 12 की बैठक और पुलकित का वह सुझाव याद आता है।
एक विद्यार्थी ने अपनी इच्छा व्यक्त की थी कि विद्यालय में पॉडकास्ट स्टूडियो होना चाहिए। हमने उस विचार को गंभीरता से लिया और आज वही विचार 300 से अधिक पॉडकास्ट की यात्रा बन चुका है।
मेरे लिए इसमें एक बहुत बड़ी सीख भी है।
विद्यालय में परिवर्तन का हर विचार शिक्षक की ओर से ही आए, यह आवश्यक नहीं है। कई बार विद्यार्थी स्वयं ऐसे विचार देते हैं, जो विद्यालय को एक नई दिशा दे सकते हैं।
इसीलिए मैं विद्यार्थियों की बात सुनने और उनके विचारों को अवसर देने को बहुत महत्व देता हूँ।
आज हमारा पॉडकास्ट स्टूडियो मेरे लिए केवल एक स्टूडियो नहीं है।
यह सीखने का स्थान है।
यह बोलने का स्थान है।
यह सुनने का स्थान है।
यह प्रश्न करने का स्थान है।
यह विचारों को साझा करने का स्थान है।
और सबसे बढ़कर, यह विद्यार्थियों को अपनी आवाज़ पहचानने का स्थान है।
एक छोटे से सुझाव से शुरू हुई यह यात्रा आज सैकड़ों संवादों का मंच बन चुकी है।
