चुनावी वर्ष में आर्थिक चुनौतियां
वित्त वर्ष 2024-25 में नई सरकार के लिए घरेलू स्तर पर सबसे बड़ी चुनौती कृषि क्षेत्र की विकास दर बढ़ाना तथा महंगाई दर को नियंत्रित करना रहेगा।
लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार लेखानुदान बजट पेश करने वाली है। मोदी सरकार-2 का यह कार्यकाल आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियों भरा रहा है। सबसे बड़ी चुनौती थी कोरोना महामारी और फिर दूसरी चुनौती घरेलू बाजार में महंगाई का उच्चतम स्तर पर बने रहना था। लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था ने न केवल हर मोर्चे पर तरक्की की, बल्कि जीडीपी के मामले में यह दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभरी।
चालू वित्तीय वर्ष 23-24 की पहली दो तिमाहियों को मद्देनजर रखते हुए 7.7 प्रतिशत की औसत विकास दर हासिल करना भी बड़ी आर्थिक सफलता है। उम्मीद की जा रही है कि संपूर्ण वित्तीय वर्ष के लिए विकास की दर सात प्रतिशत रहने का अनुमान है। इसकी मुख्य वजह एक ओर जहां घरेलू स्तर पर लगातार प्रति व्यक्ति बेहतर क्रय क्षमता है, तो दूसरी ओर बुनियादी ढांचों के विकास पर सरकार द्वारा ज्यादा खर्च है। पिछले वित्तीय बजट में केंद्र सरकार ने 10 लाख करोड़ रुपये का बजट पूंजीगत खर्चों के लिए रखा था, जिसने अर्थव्यवस्था की विकास दर को गति दी। भारतीय कंपनियों की वित्तीय हालत भी बहुत अच्छी है तथा लाभदायकता का प्रतिशत सभी कंपनियों में दोहरे अंकों में पाया जा रहा है। इसका मुख्य कारण लागत नियंत्रण है। इससे आने वाले समय में निजी निवेश के और बढ़ने की संभावनाएं हैं। बैंकिंग सेक्टर में भी पिछले वर्ष जुलाई में 10 वर्षों के बाद एनपीए सबसे कम रहा था। चालू वित्तीय घाटा इस वर्ष जीडीपी का 1.6 से 1.7 प्रतिशत रहने की संभावना है। भारत जैसी अर्थव्यवस्था के लिए इसका दो प्रतिशत से कम रहना अच्छे विकास का सूचक है।
इस वर्ष कच्चे तेल के आयात की मात्रा पिछले वर्ष की तुलना में काफी बढ़ी है, परंतु उसका चालू वित्तीय घाटे पर बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ा है, क्योंकि भारत ने रूस से भारतीय रुपये में कच्चा तेल खरीदा। वैश्विक स्तर पर चालू वित्तीय वर्ष काफी उथल-पुथल भरा रहा, जिसकी शुरुआत अमेरिका में बैंकिंग प्रणाली की विफलता से हुई। चीनी अर्थव्यवस्था में मंदी बने रहना, सभी बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाओं में उनके केंद्रीय बैंकों द्वारा लगातार ब्याज दरों को बढ़ाना आदि हमेशा चर्चाओं में रहा। इन सबके बावजूद भारतीय पूंजी बाजार में विदेशी पूंजी निवेशकों की लगातार अच्छी वित्तीय तरलता बनी रही। घरेलू निवेशकों का भी शेयर बाजार में लगातार अच्छा निवेश बना रहा है, जिसके चलते ही शेयर बाजार रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है। सभी बड़ी आर्थिक संस्थाओं ने वर्ष 2024-25 के लिए वैश्विक आर्थिक विकास की दर को कम अनुमानित किया है। आईएमएफ के मुताबिक वर्ष 2024-25 में वैश्विक विकास दर 2.9 प्रतिशत रहने की संभावना है, जो कि वर्ष 2023 में तीन प्रतिशत थी। विभिन्न विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में विकास दर 6.3 से 6.5 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं की विकास दर के कम रहने से भारत के निर्यातों को धक्का लगने की आशंका ज्यादा है। हालांकि सभी बड़े विकसित देशों के केंद्रीय बैंकों ने ब्याज की दरों में कमी करने का संकेत देना शुरू कर दिया है, परंतु वित्तीय वर्ष 2024 की दूसरी तिमाही में ही ऐसा हो सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा भी आगामी दिवाली से पहले ब्याज दरों में कटौती की संभावना नहीं है।
वित्तीय वर्ष 2024-25 में नई सरकार के लिए घरेलू स्तर पर सबसे बड़ी चुनौती कृषि क्षेत्र की विकास दर बढ़ाना तथा महंगाई दर को नियंत्रित करना रहेगा। चालू वित्तीय वर्ष में चावल तथा गेहूं का उत्पादन अनुमान से कम हुआ है। इसके अलावा, खुले बाजार में गेहूं की लागत को नियंत्रित रखने के लिए सरकार अपने बफर स्टॉक का उपयोग कर रही है, जिसके चलते सात सालों में पहली बार बफर स्टॉक अपने अनुमानित आंकड़े से नीचे आ गया है। ऐसे में मई माह तक भारत को अपने गेहूं के बफर स्टॉक के लिए आयात करना पड़ेगा। पिछले वर्ष खाद्य पदार्थों की महंगाई के चलते ग्रामीण क्रय क्षमता काफी प्रभावित हुई। कृषि क्षेत्र की विकास दर को बढ़ाना भी सरकार के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य रहेगा।